यूं उतारा मदर टेरेसा के ममत्त्व को कैनवास पर!

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M F Hussain. photo courtesy of Ayaz360
न नाक,न आंख,न होंठ,न माथा,न गाल,न बाल,बस नीली पट्टी का एक आँचल, इस तरह उसने मदर टेरेसा को पेंट करते हुए,उसमें अपने अंदर की माँ को उकेर दिया। ज़माने ने उस तस्वीर को पलकों पर उठाया और ज़िन्दगी भर नँगे पांव चलने वाले उस फ़क़ीर पेंटर को एमएफ हुसैन कहकर पुकारा…

-Hafeez Kidwai

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हफीज किदवई

उससे कहा गया कि मदर टेरेसा की पेंटिंग बनाओ। अब मदर टेरेसा मतलब, माँ । करुणा के शिखर पर बैठी मदर टेरेसा को आख़िर कैसे पेंट करें। उनके चेहरे की झुर्रियों में एक ममता को तलाशना था। दिख तो रही थी ममता मगर पहचान में नही आ रही थी।

रात रात जागकर सोचा, सबको मदर टेरेसा में माँ नज़र आती है। मुझे भी दिख रही है मगर उसकी सूरत पकड़ में नही आ रही। कौन सा रँग पकड़ूँ और कैसी नाक बनाओ। जिसमें माँ की सूरत उतर आए ।

बहुत पहले उसने अपने गांव को पेंट किया था। घने अंधेरे में गांव के रँग को पकड़कर कैनवास पर उतारा था। उस वक़्त भी उसे रंगों का भेद नज़र आ रहा था। उभरे हुए गांव के घर दिख रहे थे। छत पर बाल खोले औरत अपने मर्द पर झुकी हुई दिख गई थी। एक खिड़की सामने से खुली और उसके पीछे एक लैम्प दिख गया था। मगर सामने मौजूद मदर टेरेसा का चेहरा दिखकर भी नही दिख रहा था।

ऐसा क्यों था,उसने अपने अंदर टटोला। बिल्कुल खाली। अरे। मां का कोई चेहरा ही नही है। उसने तो अपनी मां को देखा ही नही था। माँ तो उसकी आँखों की हरकत करने से पहले ही छोड़ गई थी। अब जब माँ ही नही देखा, तो मदर टेरेसा के ममत्त्व को कैनवास पर कैसे उतारे ।

फिर उसने ब्रश उठाया । हल्के नीले रंग में डुबोया । और सफ़ेद कैनवास पर उस नीले रंग से दो लकीरें ऐसे खींची ,जैसे वह माँ का आँचल हो । और हर देखने वाला बोल उठा,यह तो मदर टेरेसा हैं ।

न नाक,न आंख,न होंठ,न माथा,न गाल,न बाल,बस नीली पट्टी का एक आँचल, इस तरह उसने मदर टेरेसा को पेंट करते हुए,उसमें अपने अंदर की माँ को उकेर दिया। ज़माने ने उस तस्वीर को पलकों पर उठाया और ज़िन्दगी भर नँगे पांव चलने वाले उस फ़क़ीर पेंटर को एमएफ हुसैन कहकर पुकारा…

एमएफ़ हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की पुरानी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे।1952 में उनकी पेंटिग्स की प्रदर्शनी ज़्यूरिख में लगी। उसके बाद तो यूरोप और अमरीका में उनकी पेंटिग्स की ज़ोर-शोर से चर्चा शुरू हो गए। वर्ष 1966 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर बनाई। ये फ़िल्म बर्लिन फ़िल्म समारोह में दिखाई गई और फ़िल्म ने गोल्डन बेयर पुरस्कार जीता।

1971 में साओ पावलो समारोह में उन्हें पाबलो पिकासो के साथ ख़ास तौर पर बुलाया गया था। 1966 में पद्मश्री,1973 में उन्हें पद्मभूषण,1986 में वह राज्यसभा सदस्य मनोनीत हुए। 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किये गए । 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने राजा रवि वर्मा पुरस्कार दिया। क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी। इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए ।

एक ऐसा महंगा लेखक,जो दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन के पास अपने दो एक अज़ीज़ दोस्तों के साथ चाय के खोमचे में चाय पीता । उनसे गप्पे मारता, बहस करता और फिर उनकी बात को मान लेता । दुनिया का अमीर तरीन पेंटर एमएफ हुसैन,जो पांव में चप्पल नही पहनता,हाथ में कूची लिए जैसे कुछ ढूंढ रहा हो । मुझे तो यह भी लगता है कि शायद वह जो बनाना चाहते थे,वह कभी बना ही न सके ।

आज उन एमएफ हुसैन का जन्मदिन है । जो अपने गांव की छत पर बैठकर रात के घने अंधेरे को पेंट करता था । उसने ज़िन्दगी में ऐसे रँग भरे की सारी दुनिया उसके सामने कैनवास बन गई । उनके पांव,उनकी कूची ने दुनिया नाप डाली । वह भारत का गर्व बनकर चमक उठे । आज भी दुनिया के बेहतरीन आर्टिस्ट के जब नाम लिए जाते हैं, तब भारत के एमएफ हुसैन की जगह बहुत ऊंची रखी जाती है । वह अंदर से एक दरवेश थे । ऐसा दरवेश जिसके लिए मोहब्बत,अपनापन,ख़ुलूस तो था ही,दुनिया की तमाम चकाचौंध से कोई रग़बत भी न थी । आज हुसैन के जन्मदिवस पर हम।लोग उन्हें पूरी अक़ीदत से ख़िराज पेश करते हैं । हार्दिक श्रधांजलि हुसैन….
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