
असम में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के भाजपा में जाने के बाद आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। ऐसे में कांग्रेस हाई कमान ने चुनाव की पूरी जिम्मेदारी प्रियंका गांधी को सौंपी है। स्क्रीनिंग कमेटी के ज़रिए इस बार ज़मीनी कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों से राय लेकर उम्मीदवार चुनने की रणनीति बनाई गई है, ताकि कांग्रेस असम में पुरानी गलतियों से बचते हुए मजबूत वापसी कर सके।
– देवेंद्र यादव-

असम में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन कुमार बोहरा के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने के बाद, आने वाले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए और भी अहम हो गए हैं। ऐसे समय में कामाख्या माता के दर्शन के बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने असम चुनाव की जिम्मेदारी खुद संभाल ली है।
हाल ही में कांग्रेस हाई कमान ने इस साल होने वाले असम विधानसभा चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी की अध्यक्ष भी प्रियंका गांधी को बनाया गया। इससे पहले 20 जनवरी को मैंने अपने ब्लॉग में लिखा था कि कांग्रेस को उम्मीदवार तय करने के लिए सिर्फ सर्वे पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। बेहतर होगा कि स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य ब्लॉक और जिला स्तर पर जाकर स्थानीय कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों से सीधे बातचीत करें। ऐसा लगता है कि कांग्रेस अब असम में इसी मॉडल को अपनाने जा रही है।
इस बार स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य जिलों में जाकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समाज के अलग-अलग वर्गों से सलाह लेकर जीतने योग्य उम्मीदवारों का चयन करेंगे। चूंकि असम की पूरी कमान प्रियंका गांधी के हाथ में है, इसलिए उम्मीद है कि यह प्रक्रिया ईमानदारी और गंभीरता से पूरी की जाएगी।
कांग्रेस लगातार विधानसभा चुनाव क्यों हार रही है, इस पर मैं पहले भी लिख चुका हूं। मेरा मानना है कि उम्मीदवार चयन के लिए कराए जाने वाले सर्वे और चुनावी राज्यों में बनाए जाने वाले वार रूम कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हुए हैं। अक्सर देखा गया है कि दिल्ली से नेता हवाई जहाज से आते हैं, पांच सितारा होटलों में रुकते हैं, वार रूम में चुनिंदा बड़े नेताओं से मिलते हैं और वहीं से टिकटों का फैसला कर वापस दिल्ली लौट जाते हैं। आम कार्यकर्ता की बात न तो सुनी जाती है और न ही उसे मौका मिलता है।
जब उम्मीदवारों की सूची जारी होती है, तब तक कांग्रेस आधी लड़ाई हार चुकी होती है। कार्यकर्ताओं में नाराजगी फैलती है, टिकटों की बंदरबांट और खरीद-फरोख्त के आरोप लगने लगते हैं। इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ता है।
शायद इसी वजह से कांग्रेस हाई कमान ने असम में पुरानी और ज़मीनी रणनीति अपनाने का फैसला किया है। इस बार उम्मीदवारों का चयन जिलों में जाकर, स्थानीय कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों से बातचीत करके किया जाएगा।
असम विधानसभा चुनाव की अभी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन यह चुनाव कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें असम ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की जीत की संभावना सबसे ज्यादा मानी जा रही है। असम में कांग्रेस का संगठन तरुण गोगोई के नेतृत्व में पहले से ही मजबूत रहा है। अब जरूरत है भरोसे की—पार्टी हाई कमान को स्थानीय नेतृत्व पर पूरा विश्वास करना होगा।
शायद इसी सोच के तहत प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस के मजबूत रणनीतिकार डी के शिवकुमार और प्रमुख मुस्लिम नेता इमरान मसूद को भी असम की जिम्मेदारी में शामिल किया गया है।
कांग्रेस हाई कमान ने अनुभवी नेताओं की टीम तो भेजी है, लेकिन यह भी जरूरी है कि दिल्ली से ऐसे नेताओं की भीड़ न पहुंचे जो चुनावी राज्यों में “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना” बनकर नुकसान पहुंचाते हैं।
अब समय आ गया है कि कांग्रेस दिल्ली के नेताओं से ज्यादा भरोसा असम के स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं पर करे और उन्हें ही चुनाव की असली कमान सौंपे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















