
हाईकमान का यह निर्देश भी अहम है कि एक बार कार्यकारिणी घोषित हो जाने के बाद कोई नया पदाधिकारी नहीं बनाया जाएगा। बीते वर्षों में देखा गया है कि कार्यकारिणी घोषित होने के बावजूद जिलों, प्रदेशों और राष्ट्रीय स्तर पर नियुक्तियां होती रहीं। इससे संगठन को फायदा नहीं हुआ, बल्कि आरोप लगे कि कांग्रेस में पद बेचे जाते हैं।
-देवेन्द्र यादव-
कांग्रेस अब जिलों की जंबो कार्यकारिणी पर लगाम कसने की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। पार्टी को मजबूत करने के लिए यह हाईकमान का एक बेहतर और समयानुकूल फैसला माना जा रहा है। कांग्रेस हाईकमान ने सभी प्रदेश अध्यक्षों को निर्देश दिए हैं कि जिलों में पदाधिकारियों की संख्या 31 से 51 के बीच ही रखी जाए।
फिलहाल स्थिति यह है कि जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर कागजों में पदाधिकारियों की भरमार है। हालत यह हो चुकी है कि एक पदाधिकारी दूसरे पदाधिकारी को भी नहीं जानता कि वह किस पद पर है। हर कोई कांग्रेस का पद लेकर ऐसे घूमता नजर आता है जैसे हल्दी की गांठ लेकर पंसारी बैठा हो।
मैं पहले भी अपने ब्लॉग और यूट्यूब चैनल पर कह चुका हूं कि हाईकमान को जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ‘हल्दी की गांठ’ बांटने की परंपरा बंद करनी चाहिए। इससे कांग्रेस को फायदा नहीं बल्कि नुकसान हो रहा है। अब हाईकमान ने फरमान जारी किया है कि जिला अध्यक्ष अपनी कार्यकारिणी को जंबो नहीं, बल्कि सीमित बनाएं।
लेकिन असली सवाल जिलों का नहीं है। बड़ा सवाल तो प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर बैठे उन पंसारियों का है, जो केवल पद लेकर राजनीति कर रहे हैं।
हकीकत यह है कि आज भी कई जिलों में कार्यकारिणी सीमित ही है, लेकिन प्रदेश और राष्ट्रीय कार्यकारिणियां उनसे कहीं ज्यादा बड़ी हैं। जो खानदानी कांग्रेसी हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी पार्टी में रहे हैं, वे जानते हैं कि पहले राष्ट्रीय और प्रदेश कार्यकारिणी में कितने पदाधिकारी होते थे और आज कितने हैं।
जब कार्यकारिणी सीमित होती थी, तब कांग्रेस देश में मजबूत होती थी। तब कांग्रेस राज्यों से लेकर केंद्र तक चुनाव जीतती थी। आज स्थिति उलट है,पदाधिकारी पहले से कई गुना ज्यादा हैं, लेकिन कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही है और विधानसभा चुनाव हार रही है।
अगर राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बात करें तो केवल सचिव और सह-सचिव ही लगभग 80 के करीब हैं। यही हालत प्रदेश कार्यकारिणियों की भी है। सवाल यह है कि इतने पदाधिकारी होने के बावजूद संगठन मजबूत क्यों नहीं हो पा रहा?
जिला स्तर पर संख्या सीमित करना अच्छी पहल है, लेकिन इसका असर तभी दिखेगा जब हाईकमान प्रदेश और राष्ट्रीय कार्यकारिणियों में भी पदाधिकारियों की संख्या सीमित करेगा।
साथ ही हाईकमान का यह निर्देश भी अहम है कि एक बार कार्यकारिणी घोषित हो जाने के बाद कोई नया पदाधिकारी नहीं बनाया जाएगा। बीते वर्षों में देखा गया है कि कार्यकारिणी घोषित होने के बावजूद जिलों, प्रदेशों और राष्ट्रीय स्तर पर नियुक्तियां होती रहीं। इससे संगठन को फायदा नहीं हुआ, बल्कि आरोप लगे कि कांग्रेस में पद बेचे जाते हैं।
बार-बार पदाधिकारी बनाने की प्रवृत्ति ने ही जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय कार्यकारिणियों को जंबो बना दिया है।
अब समय आ गया है कि कांग्रेस केवल जिलों में ही नहीं, बल्कि प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भी पदों की संख्या घटाकर संगठन को वास्तविक रूप से मजबूत बनाए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)


















