नहीं देख पाया धान के गुच्छे पर चमकता ओस-कण” !

badrinaath
फोटो साभार अरूण कुमार तिवारी

-रविन्द्र नाथ टैगोर के जन्मदिवस पर विशेष…

-प्रतिभा नैथानी-

प्रतिभा नैथानी

“सालों साल यात्राएं की हैं मैंने
मीलों दूर के समुद्र देखे, पहाड़ देखे
पर नहीं देख पाया
जो था मेरे द्वार से बस दो कदम दूर-
धान के गुच्छे पर चमकता ओस-कण” !

यह गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की बांग्ला कविता का एक अंश है, जो कभी उन्होंने छह साल के नन्हे सत्यजीत राय की ऑटोग्राफ बुक पर लिखी थी।
शांतिनिकेतन से शिक्षा ग्रहण करने के बाद सत्यजीत रे फिल्म निर्देशक बने। इस महान फिल्मकार पर जब-जब कुछ लिखा गया , गुरुदेव की यह कविता भी तब-तब जीवित हो जाती रही।

अपने दार्जिलिंग प्रवास के दौरान रवीन्द्रनाथ ने इसी तरह एक कविता जयंती को भी लिखी थी। शांतिनिकेतन की प्राक्तन छात्रा जयंती के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं , किंतु शांतिनिकेतन में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते थे कि ‘कभी मेरी कलम की उत्तराधिकारी जयंती ही होगी’ ।

गुरुदेव ने उसका नाम रखा था ‘भारत माता’। रवीन्द्रनाथ टैगोर का जयंती पर अनन्य स्नेह था। स्वास्थ्य लाभ की इच्छा से गुरुदेव जब उसके गृहनगर अल्मोड़ा आए तो उनकी इस प्रिय छात्रा ने अमर-कोश के वनौषधि पर्व से पढ़ जंगली फूलों को ढूंढ-ढूंढ कर उनसे पहाड़ी रंग तैयार किए थे कि बंगाल की भीषण गर्मी से उकताया गुरुदेव का मन , पहाड़ की सुखद जलवायु का रचनात्मक प्रभाव अपनी चित्रकारी में भर सके।

‘देश’ पत्रिका में प्रकाशित रवीन्द्रनाथ के पत्र में उल्लेख है कि कैसे जयंती ने हरिद्रा, खदिर,पलाश, बुरांश से अभिनव रंग बनाए थे।
वह चित्र उन्होंने जयंती को ही समर्पित कर दिया था, जिस पर बांग्ला में लिखा है ‘जयंती के – रवींद्रनाथ’ ।
जयंती की तरह ही वह पेंटिंग भले ही दुनिया की नज़रों से ओझल हो, मगर उम्मीद है कि उनके पुत्र प्रोफेसर पुष्पेश पंत के पास वह अभी भी सुरक्षित होगी।

शिक्षक और विद्यार्थी के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान का सबसे सहज और कोमल सेतु का नाम है ‘गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर’। शांतिनिकेतन को उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलवाई थी। देश-विदेश के अनेक छात्र- छात्राओं ने यहां से शिक्षा ग्रहण कर साहित्य, संगीत, कला, सिनेमा, विज्ञान, पत्रकारिता, राजनीति , समाज सेवा जैसे सभी क्षेत्रों में अपना परचम लहराया, और गुरुदेव विश्व धरोहर हो गए। 7 मई जन्मदिवस पर जयंती पंत की स्मृतियों के ‘गुरूदेव’ उन्हें उत्तराखंड से भी जोड़ते हैं।

 

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