
राजस्थान कांग्रेस की यह “गुर्जर चौकड़ी” पार्टी का ब्रह्मास्त्र भी है और संभावित विस्फोटक संतुलन भी। अगर सामंजस्य रहा तो 2028 में कांग्रेस मजबूत चुनौती पेश करेगी। अगर अहं टकराए, तो यही शक्ति पार्टी के लिए सबसे बड़ी बाधा बन सकती है।
-देवेंद्र यादव-

राजस्थान की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से सत्ता की दिशा तय करते रहे हैं। जाट, राजपूत, दलित, आदिवासी और मुस्लिम वोट बैंक की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन पिछले एक दशक में एक और सामाजिक शक्ति संगठित राजनीतिक रूप में उभरी है, गुर्जर नेतृत्व। कांग्रेस के भीतर इस समय गुर्जर समुदाय के चार बड़े चेहरे मौजूद हैं, और यही “गुर्जर चौकड़ी” 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की ताकत भी बन सकती है और चुनौती भी।
सचिन पायलट जो केंद्र में मंत्री रहे राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे, 2018 में राजस्थान में पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस ने राजस्थान की सत्ता में वापसी की मगर पायलट मुख्यमंत्री नहीं बने उन्हें राज्य का उपमुख्यमंत्री बनाया गया मगर विवाद के कारण उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटना पड़ा था, लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस हाई कमान ने सचिन पायलट को कांग्रेस का राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दी, पायलट 2018 से ही राज्य में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के बड़े चेहरे हैं।

दूसरा नाम धीरज गुर्जर का है जो कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के से प्रभारी हैं।
तीसरा नाम अशोक चांदना का है जो राजस्थान प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं और राजस्थान सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं अभी वह बूंदी जिले की हिंडोली विधानसभा के सदस्य हैं।
चौथे नेता 2023 का भाजपा के टिकट पर चुनाव हारने के बाद 2024 में कांग्रेस में शामिल होकर कोटा संसदीय क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला के सामने चुनाव लड़े मगर वह कुछ अंतर से चुनाव हार गए प्रहलाद गुंजल भी बड़ा चेहरा है।
यदि गुर्जर नेताओं की चौकड़ी की बात करें और बात करें कि मजबूत और ताकतवर नेता इन चारों में से कौन है, तो पहला नाम सचिन पायलट का आएगा लेकिन भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए नेता प्रहलाद गुंजल भी लोकप्रियता मैं पायलट से कम नहीं है, बस फर्क है तो इतना की प्रहलाद गुंजल भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे, प्रहलाद गुंजल कितने लोकप्रिय हैं इसका एहसास कांग्रेस के नेताओं को हो या ना हो लेकिन लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला और भाजपा को जरूर है क्योंकि प्रहलाद गुंजल ने 2024 के लोकसभा चुनाव में ओम बिरला के पसीने छुड़ा दिए थे। यदि कांग्रेस के बड़े नेता ईमानदारी से प्रहलाद गुंजल के साथ खड़े होते तो शायद ओम बिरला चुनाव भी हार सकते थे.
ओम बिरला से लोकसभा चुनाव हारने के बाद से प्रहलाद गुंजल कोटा संसदीय क्षेत्र में लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं, कोटा संसदीय क्षेत्र से सांसद ओम बिरला भी 2014 के बाद पहली बार अपने कोटा संसदीय क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रहे हैं क्या यह प्रहलाद गुंजल की सक्रियता का बिरला को डर है।
सवाल यह है कि, गुर्जर नेताओं की चौकड़ी मैं से कौन नेता कांग्रेस के भीतर प्रभावशाली है और, 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान कांग्रेस का नेतृत्व करेगा, क्योंकि कर में से तीन नेता सचिन पायलट धीरज गुर्जर और अशोक चांदना दिल की ख्वाहिश यह है कि पार्टी हाई कमान विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान कांग्रेस की कमान उनके हाथ में दे दे लेकिन क्या यह संभव है और यदि तीनों में से किसी एक के हाथ में राजस्थान कांग्रेस की कमान हाय कमाने दे भी दी तो क्या चारों नेता एकजुट रहेंगे और कांग्रेस की राजस्थान की सत्ता में वापसी करवा पाएंगे यह सबसे बड़ा सवाल है और इस सवाल के उत्तर का इंतजार अभी करना होगा।
ताकत कहां है?
अगर ये चारों नेता एकजुट होकर काम करते हैं तो:
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पूर्वी राजस्थान में मजबूत सामाजिक पकड़
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हाड़ौती क्षेत्र में भाजपा को सीधी चुनौती
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युवा और ओबीसी मतदाताओं में प्रभाव
यह संयोजन कांग्रेस को 25–30 सीटों का फायदा दिला सकता है।
मगर खतरा भी यहीं छिपा है
समस्या बाहरी नहीं, आंतरिक महत्वाकांक्षा है।
इनमें से तीन नेता पायलट, धीरज और चांदना संगठनात्मक कमान की इच्छा रखते हैं। गुंजल खुद को हाड़ौती का बड़ा चेहरा मानते हैं। अगर नेतृत्व एक को मिलता है और बाकी असंतुष्ट रहते हैं, तो:
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गुटबाजी
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टिकट वितरण विवाद
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क्षेत्रीय टकराव
ये सब कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

















