
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपने संगठनात्मक ढांचे को पुनर्संतुलित करने की है। यदि प्रदेश अध्यक्ष पद महत्वाकांक्षा की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बना रहेगा, तो पार्टी की लड़ाई विपक्ष से पहले अपने ही घर में चलती रहेगी।
-देवेंद्र यादव-

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस इन दिनों केवल विपक्ष से ही नहीं, बल्कि अपनी अंदरूनी संरचनात्मक समस्याओं से भी जूझती नजर आ रही है। राज्यों में लगातार चुनावी हार के पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं, लेकिन एक कारण ऐसा है जो लगभग हर राज्य में समान रूप से दिखाई देता है, प्रदेश अध्यक्ष पद को मुख्यमंत्री पद की सीधी दावेदारी के रूप में देखा जाना। यह धारणा कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के बजाय उसे गुटों में बांटने का काम कर रही है।
प्रदेश अध्यक्ष बनने का मतलब मुख्यमंत्री की कुर्सी का दावा पक्का, यह सिलसिला कांग्रेस के भीतर बड़े पैमाने पर 2003 में श्रीमती सोनिया गांधी के युग में शुरू हुआ था, तब श्रीमती सोनिया गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष थी और कांग्रेस ने राजस्थान मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और दिल्ली में अपनी सरकार बनाई थी। अब इन राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह, अजीत जोगी और श्रीमती शीला दीक्षित थी, और जब इन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी तो यह चारों ही नेता अपने-अपने राज्यों के मुख्यमंत्री बने थे। शीला दीक्षित और दिग्विजय सिंह ने तो अपनी सरकार को 2008 में रिपीट किया था लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस बुरी तरह से चुनाव हारी, कांग्रेस की हार का कारण वही था प्रदेश अध्यक्ष बनने का मतलब मुख्यमंत्री पद का दावा पक्का।
समय के साथ यह प्रवृत्ति कांग्रेस के लिए समस्या बनती चली गई। प्रदेश अध्यक्ष बनने वाले नेता संगठन को विस्तार देने की बजाय स्वयं को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार साबित करने में ऊर्जा लगाने लगे। दूसरी ओर, जो नेता पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं, वे भी अपनी पकड़ ढीली करने को तैयार नहीं होते। परिणामस्वरूप राज्यों में एक से अधिक शक्ति केंद्र बन जाते हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होती है और जमीनी कार्यकर्ता असमंजस में पड़ जाता है।
राजस्थान इसका प्रमुख उदाहरण है। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में हुई, लेकिन मुख्यमंत्री पद अशोक गहलोत को मिला। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच खींचतान सार्वजनिक रूप से सामने आई। 2023 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।
अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा भी राज्य की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, जबकि पायलट समर्थक फिर से संगठन की कमान उनके हाथ में देने की मांग कर रहे हैं। चुनाव में अभी समय है, लेकिन संगठन पहले ही नेतृत्व की संभावनाओं के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है।
छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल के बीच नेतृत्व संतुलन की चर्चा लंबे समय तक रही। मध्य प्रदेश में भी नेतृत्व को लेकर स्पष्टता की कमी देखी गई। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में भी समय-समय पर गुटबाजी खुलकर सामने आती रही है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा प्रभावित कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता होता है। उसे स्पष्ट दिशा नहीं मिलती कि संगठनात्मक निष्ठा किसके प्रति रखी जाए। इससे बूथ स्तर का ढांचा कमजोर पड़ता है, जो चुनावी राजनीति में निर्णायक होता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका को स्पष्ट रूप से संगठन तक सीमित रखना होगा और मुख्यमंत्री का चेहरा चुनाव के बाद विधायक दल पर छोड़ना होगा। जब तक संगठनात्मक पदों को सत्ता की दावेदारी से अलग नहीं किया जाएगा, तब तक आंतरिक टकराव पार्टी की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित करता रहेगा।
सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस कार्यकर्ता का होता है। उसे समझ नहीं आता “किसके साथ खड़ा रहूं, संगठन वाले नेता के साथ या सत्ता वाले?” जब जमीनी कार्यकर्ता कन्फ्यूज हो जाए, तो पार्टी का ढांचा खोखला हो जाता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















