
राजस्थान की जनता और कांग्रेस कार्यकर्ता अब ‘गांधी परिवार की नजदीकी’ के झांसे में आने वाले नहीं हैं। यदि कांग्रेस को 2028 में सत्ता में वापसी करनी है और 2029 की चुनावी जंग लड़नी है, तो उसे राज्यसभा के लिए ‘स्थानीय प्रभाव’ और ‘सामाजिक समीकरण’ (विशेषकर मुस्लिम प्रतिनिधित्व) को प्राथमिकता देनी होगी। पवन खेड़ा दिल्ली में पार्टी की आवाज हो सकते हैं, लेकिन राजस्थान की सियासी प्यास बुझाने के लिए उन्हें ‘रेगिस्तान की धूल’ फांकनी होगी, जो फिलहाल उनके ट्रैक रिकॉर्ड में नजर नहीं आता।
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा की हाल के दिनों में राजस्थान के नेताओं के साथ अचानक बढ़ी नजदीकियां राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह केवल संगठनात्मक सक्रियता है या फिर इसी साल होने वाले राज्यसभा चुनाव की रणनीतिक तैयारी? दिल्ली में राजस्थान को लेकर हो रही कांग्रेस की बैठकों में पवन खेड़ा की मौजूदगी और नेताओं से गर्मजोशी से मिलना इस ओर इशारा कर रहा है कि उनकी नजर राजस्थान से राज्यसभा सीट पर है। चर्चा है कि पवन खेड़ा कांग्रेस की ओर से राजस्थान से राज्यसभा में जाना चाहते हैं और इसी वजह से वे इन दिनों राजस्थान लॉबी के करीब दिखाई दे रहे हैं।
राहुल-खड़गे की बैठक और खेड़ा की मौजूदगी का संदेश
गुरुवार, 29 जनवरी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राजस्थान को लेकर अहम बैठक की। इसमें प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट, प्रदेश प्रभारी सुखजिंद्र सिंह रंधावा, भंवर जितेंद्र सिंह और हरीश चौधरी शामिल थे। इसी बैठक में पवन खेड़ा भी नजर आए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि खेड़ा की मौजूदगी सिर्फ औपचारिक नहीं थी, बल्कि वह राजस्थान के नेताओं को यह संदेश देना चाहते थे कि वे राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या दिल्ली की नजदीकी राजस्थान की राजनीति में काम आती है?
राजस्थान में खेड़ा की ज़मीनी पहचान कमजोर
हकीकत यह है कि पवन खेड़ा भले ही राजस्थान से हों, लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका कभी नजर नहीं आई। न तो राजस्थान का आम कांग्रेस कार्यकर्ता उन्हें एक जमीनी नेता के तौर पर जानता है और न ही आम जनता के बीच उनका कोई सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव है।
जबकि इस वक्त कांग्रेस को राजस्थान में ऐसे चेहरों की जरूरत है जिनकी पहचान मोहल्लों, कस्बों और पंचायतों तक हो। राहुल गांधी भी देशभर में संगठन सृजन इसी सोच के साथ कर रहे हैं कि सत्ता का आधार नीचे से मजबूत किया जाए। इस कसौटी पर पवन खेड़ा फिलहाल फिट नहीं बैठते दिखते।
गांधी परिवार की नजदीकी बनाम प्रदेश का हित
राजस्थान से राज्यसभा जाने वाले अधिकांश नेताओं को लेकर पुरानी शिकायत रही है कि उन्हें गांधी परिवार की नजदीकी के आधार पर चुना जाता है, न कि प्रदेश की जरूरत के हिसाब से। कई बार राजस्थान के नेता इस भ्रम में आ जाते हैं कि “दिल्ली के करीबी” को भेजने से प्रदेश मजबूत होगा, जबकि व्यावहारिक तौर पर फायदा व्यक्ति विशेष को ही मिलता है, संगठन को नहीं। अशोक गहलोत ने भी इसी रणनीति का राजनीतिक लाभ उठाया, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पवन खेड़ा को राज्यसभा नहीं भेजा, जबकि उस समय खेड़ा प्रमुख दावेदारों में गिने जाते थे।
2028-2029 की तैयारी में राज्यसभा का समीकरण अहम
अगर कांग्रेस को 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान में वापसी करनी है, तो राज्यसभा चयन को केवल पुरस्कार की तरह नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना होगा।
राजस्थान में कांग्रेस की जीत अक्सर उन क्षेत्रों से जुड़ी होती है जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक होती है। बावजूद इसके लंबे समय से राजस्थान से कोई मुस्लिम चेहरा राज्यसभा में नहीं पहुंचा है। इतना ही नहीं, 25 लोकसभा सीटों में से एक पर भी मुस्लिम सांसद नहीं है।
ऐसे में संगठन के भीतर यह बहस तेज हो रही है कि कांग्रेस को राज्यसभा में ऐसे स्थानीय और प्रभावशाली नेताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जो जनता के बीच पकड़ रखते हों, न कि सिर्फ दिल्ली दरबार में पहचान रखते हों।
डोटासरा-जूली की मेहनत बनाम दिल्ली रणनीति
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली लगातार संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। दोनों जमीन पर सक्रिय हैं और राहुल गांधी के “संगठन सृजन” मिशन को राजस्थान में गंभीरता से लागू कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस नेतृत्व ने केवल दिल्ली की पसंद पर फैसले लिए और राजस्थान की सामाजिक-राजनीतिक ज़रूरतों को नजरअंदाज किया, तो 2028 की राह आसान नहीं होगी।

















