
-सुनील कुमार Sunil Kumar
ओडिशा की एक दिल दहलाने वाली खबर है कि 65 बरस की एक विधवा दादी ने अपने 7 बरस के पोते को भुखमरी से बचाने के लिए दो सौ रूपए में बेच दिया। बरसों पहले ओडिशा का कालाहांडी का इलाका बहुत सी भूख-मौतों को देखता था, और वह भुखमरी की रिपोर्टिंग करने वाले देश-विदेश के अखबारों के लिए पसंदीदा जगह रहती थी। अब हाल के बरसों में सरकारी राशन के इंतजाम की वजह से देश में भुखमरी खत्म सरीखी हो चुकी है, और ऐसी कोई घटनाएं सामने आती नहीं हैं, लेकिन कई भरोसेमंद समाचार माध्यमों में इस घटना की जानकारी बड़े खुलासे से आई है, और उन्हें सच मानकर ही हम यह बात लिख रहे हैं। ओडिशा के बल्दिया में 65 बरस की महिला, मांद सोरेन के पति का निधन हो गया था, बेटा लापता हो गया था, और बहू की कोरोना-मौत हो गई थी। ऐसे में 7 बरस का पोता इस बुजुर्ग महिला की जिम्मेदारी हो गया, और वह भीख मांगकर इस बच्चे को बड़ा कर रही थी। लेकिन अब बुढ़ापा और कमजोर सेहत परेशान करने लगे, बच्चे की देखभाल मुश्किल होने लगी, तो उसने एक व्यक्ति को दो सौ रूपए में उस बच्चे को बेच दिया, यह सोचकर कि वह कम से कम उसे ठीक से खिलाएगा, और पढ़ाएगा। इस बारे में जब अफसरों को पता लगा, तो पुलिस तुरंत हरकत में आई, और बाल संरक्षण विभाग में दखल दी, और दादी और बच्चे दोनों को लाकर सरकारी हिफाजत और इंतजाम में रखा गया है।
आज ओडिशा में भाजपा की डबल इंजन की सरकार है, और पिछले कुछ बरसों से अगले कई बरस तक केन्द्र सरकार की तरफ से देश के 80 करोड़ लोगों को पांच किलो राशन हर महीने दिया जा रहा है, जिससे भुखमरी की गुंजाइश बच नहीं जाती है। फिर भी इतने बड़े सरकारी इंतजाम में कई जगहों पर कमजोरियां रह जाती हैं, और हमारे ही नंबरों पर पड़ोसी राज्य एमपी के राशन या खाद के संदेश आते रहते हैं। जाहिर है कि कहीं कोई नंबर गलत चढ़ गया है। और आज तो सरकार की किसी भी योजना का फायदा लेने के लिए आधार कार्ड से लेकर दूसरी कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं, और देश में बुजुर्गों के बीच अशिक्षा इतनी अधिक है कि वे कई तरह के काम कर नहीं पाते हैं। लोगों को याद होगा कि इसी ओडिशा की एक रिपोर्ट कुछ अरसा पहले ऐसी आई थी कि एक विकलांग महिला 70 बरस की उम्र में वृद्धावस्था पेंशन के कुछ सौ रूपए महीने लेने के लिए हाथ-पैर चारों से चलते हुए दो किलोमीटर दूर पंचायत तक जाती-आती थी। ऐसे दूसरे भी बहुत से मामले देश भर में बिखरे हुए रहते हैं जहां सरकारी योजनाओं के लागू होने पर भी लोग उनका फायदा पाने की हालत में नहीं रहते, इनमें से अधिकतर लोगों के कागजात पूरे नहीं रहते, और वे कागजी कार्रवाई नहीं कर पाते। दूसरी तरफ सरकार की बहुत सी ऐसी योजनाएं रहती हैं जिनमें अपात्र और संपन्न लोग भी अपनी चतुराई से कम कमाई के कागजात बनवाकर फायदा पाने लगते हैं, और उनकी रोक-टोक करने का भी सरकार के पास कोई इंतजाम नहीं रहता।
हम इसे सरकार के हिस्से की बहुत बड़ी कमजोरी इसलिए नहीं मानते कि जब आबादी के आधे से अधिक लोगों को राशन का फायदा मिलना है, दसियों करोड़ लोगों को सरकार की दर्जनों और योजनाओं का फायदा मिलना है, इनमें केन्द्र और राज्य सरकारों की कई औपचारिकताएं पूरी करनी रहती हैं, कई जगहों पर आजकल चोरी को रोकने के लिए कई तरह की जांच ऑनलाईन होने लगी है, और नेटवर्क की दिक्कत रहती है। इन सबके बीच अगर जरूरतमंद लोगों का एक बहुत बड़ा तबका फायदा पाता है, तो वह भी समाज के लिए छोटी बात नहीं है। अब जरूरत दो बातों की बराबरी से है, पहली तो यह कि छूट गए जरूरतमंद लोगों को सरकार और समाज सब मिलकर फायदे तक पहुंचाने का काम करें, और दूसरी बात यह कि जो सक्षम और अपात्र लोग सरकार की रियायत और मदद की योजनाओं का नाजायज फायदा उठा रहे हैं, उन्हें पकड़ा जाए, और उनसे वसूली की जाए। हम शहरों में देखते हैं कि सडक़ किनारे खुलेआम ठेले-खोमचे वाले रियायती-घरेलू गैस सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, न उन्हें किसी कार्रवाई का खौफ रहता, और न ही कोई कार्रवाई होती ही है। दरअसल यह रियायत केन्द्र सरकार के पैसों से मिलती है, और राज्य सरकार पर न उसका बोझ रहता, और न ही राज्य सरकार को उसकी कोई परवाह रहती। रियायतों की ऐसी ही चोरी कहीं बिजली को लेकर होती है, तो कहीं किसी और सरकारी योजना की। भारत के लोगों में नाजायज फायदा पाने की सोच इतनी मजबूत हो चुकी है कि अधिकतर लोग इस ताक में रहते हैं कि नियमों के बीच कोई छेद ढूंढकर उसमें से हाथ डाला जाए, और फायदा निकाल लिया जाए।
सक्षम लोगों की ऐसी चोरी के बीच हर शहर में सडक़ों, और फुटपाथों पर कई ऐसे गरीब, विकलांग, बीमार, बेघर, और विक्षिप्त लोग दिखते हैं, जिनका कोई सहारा नहीं रहता, जिनके पास कोई कागज नहीं रहता, और जो किसी सरकारी दफ्तर में पहुंचकर कोई भी औपचारिकता पूरी करने की हालत में नहीं रहते। इनमें से जो बच्चे रहते हैं, वे कचरा उठाने जैसा काम करने लगते हैं, और नशा करने लगते हैं। बूढ़े और बीमार, विक्षिप्त और विकलांग भीख मांगने लगते हैं, और थोड़ा-बहुत काम करने में सक्षम जवान लोग इस ताक में रहते हैं कि कब किसी धर्म का कोई भंडारा लगे, और वहां पर मुफ्त में खाना पाया जा सके, और बाकी वक्त वे भी भीख मांगने पर भरोसा रखते हैं।
सरकार को इन तबकों के तमाम लोगों के लिए निराश्रित गृह बनाने चाहिए, और एक बार ढांचा खड़ा होने के बाद उसे किसी भरोसेमंद सामाजिक संगठन के साथ मिलकर चलाना चाहिए। सडक़ों पर से ऐसे तमाम लोगों को हटाकर इन निराश्रित गृहों में रखा जाना चाहिए, क्योंकि कई जगह विकलांग और विचलित लड़कियों और महिलाओं से बलात्कार के मामले तब आते हैं, जब वे गर्भवती हो जाती हैं, उसके बाद फिर बलात्कारियों की तलाश शुरू होती है। सरकार को ऐसे बेजुबान तबकों को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता मानना चाहिए क्योंकि अब तो सरकारें एक सीमा से कम कमाई वाले परिवारों को वैसे भी कई तरह से सीधी नगद मदद देती है, या बिना भुगतान अनाज देती है। सडक़-फुटपाथ के ये लोग अपनी शारीरिक और मानसिक वजहों से ऐसी योजनाओं तक नहीं पहुंच पाते, और किसी भी जनकल्याणकारी सरकार को इन्हें संस्थागत हिफाजत मुहैया करानी चाहिए। इससे देश में कम से कम कुछ करोड़ लोगों का भला होगा, और वे इंसान की तरह रह सकेंगे, खा और सो सकेंगे। ऐसे संस्थागत इंतजाम में इन पर सरकार का बहुत बड़ा खर्च भी नहीं होगा, और इलाज के जरूरतमंद इन लोगों का योजनाबद्ध इलाज भी हो सकेगा। सरकारों को ऐसे कमजोर तबकों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जो संगठित होकर आवाज नहीं उठा सकते, जो कोई वोटर-समूह नहीं हैं, लेकिन इस देश के सबसे जरूरतमंद लोग हैं। शायद केन्द्र सरकार ही पहल करके पूरे देश के हर छोटे-बड़े शहर में ऐसा ढांचा विकसित कर सके, और फिर राज्य सरकारें समाज के सहयोग से उन्हें चला सकें।
(देवेन्द्र सुरजन की वॉल से साभार)