
वसुंधरा राजे यह अच्छी तरह समझती हैं कि राजनीति में पद से ज्यादा अहमियत ज़मीनी ताकत की होती है। यही वजह है कि उनके लिए आने वाले पंचायत और निकाय चुनाव सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने का मंच हैं। वसुंधरा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह संकेत दिया था कि राजस्थान में उनकी पकड़ आज भी मजबूत है।
-देवेन्द्र यादव-

14 जनवरी को मलमास समाप्त होते ही भारतीय जनता पार्टी को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल गया। नितिन नवीन के रूप में भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर नई शुरुआत का संकेत दे दिया, लेकिन राजस्थान में मलमास खत्म होने के बाद भी न मंत्रिमंडल का पुनर्गठन हुआ और न ही राजनीतिक नियुक्तियों की कोई हलचल दिखाई दी। इससे पहले जहां गलियारों में रोज चर्चाएं गर्म रहती थीं, अब वहां अचानक खामोशी छा गई है।
सवाल उठने लगा है, क्या राजस्थान में भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा वही राजनीतिक रणनीति अपना रहे हैं, जो कभी कांग्रेस सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनाई थी? गहलोत ने भी अपने कार्यकाल के शुरुआती दौर में नहीं, बल्कि अंतिम वर्षों में राजनीतिक नियुक्तियां की थीं। क्या भजनलाल शर्मा भी समय का इंतजार कर रहे हैं और विधानसभा चुनाव नजदीक आने पर ही मंत्रिमंडल में फेरबदल करेंगे?
फिलहाल राजस्थान विधानसभा का सत्र चल रहा है। सत्र समाप्त होते ही पंचायत राज और निकाय चुनावों की घोषणा होना तय मानी जा रही है। ऐसे में निकट भविष्य में मंत्रिमंडल विस्तार या राजनीतिक नियुक्तियों की संभावना बेहद कम नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा पहले इन चुनावों में मंत्रियों और विधायकों की परफॉर्मेंस देखेगी, उसके बाद ही संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर बदलाव करेगी।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मलमास खत्म होने से पहले जिस नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा थी, वह अचानक क्यों थम गई? चर्चा थी कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पार्टी हाईकमान राजस्थान में कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकता है। मगर समय बीतने के साथ वसुंधरा समर्थकों की उम्मीदें कमजोर पड़ती जा रही हैं। अब सवाल यह नहीं कि चर्चा क्यों खत्म हुई, बल्कि यह है कि क्या वसुंधरा राजे को सच में कोई बड़ी भूमिका मिलेगी भी या नहीं?
वसुंधरा राजे फिलहाल भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन होना है। ऐसे में यह भी देखना होगा कि वसुंधरा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद बरकरार रहता है या नहीं, और पार्टी हाईकमान उन्हें किस तरह की जिम्मेदारी सौंपता है। यह केवल संगठन का सवाल नहीं है, बल्कि राजस्थान की राजनीतिक दिशा तय करने वाला मुद्दा भी है।
वसुंधरा राजे यह अच्छी तरह समझती हैं कि राजनीति में पद से ज्यादा अहमियत ज़मीनी ताकत की होती है। यही वजह है कि उनके लिए आने वाले पंचायत और निकाय चुनाव सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने का मंच हैं। वसुंधरा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह संकेत दिया था कि राजस्थान में उनकी पकड़ आज भी मजबूत है।
भाजपा ने 2023 में सत्ता में वापसी के बाद वसुंधरा को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा झटका लगा। जहां 2014 और 2019 में भाजपा ने राजस्थान की लगभग सभी सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में उसे करीब 12 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। इस गिरावट को वसुंधरा समर्थक नेतृत्व संतुलन की कमी से जोड़ते हैं।
अब पंचायत और निकाय चुनाव यह साफ कर देंगे कि वसुंधरा राजे संतुष्ट हैं या नाराज़। यही चुनाव बताएंगे कि 2028 के विधानसभा चुनावों में हवा किस ओर बहने वाली है, क्या कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी या भाजपा लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचेगी।
फिलहाल भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सीधी चुनौती मिलती नजर नहीं आ रही। उल्टा, जैसे-जैसे समय गुजर रहा है, भजनलाल शर्मा पार्टी संगठन और सरकार दोनों में मजबूत नेता के रूप में उभरते दिख रहे हैं। वे धीरे-धीरे सत्ता के केंद्र में अपनी पकड़ बना रहे हैं और हाईकमान का भरोसा भी हासिल कर रहे हैं।
लेकिन राजनीति में खामोशी हमेशा स्थायी नहीं होती। मलमास तो खत्म हो गया, लेकिन राजस्थान की राजनीति में असली हलचल अभी बाकी है। मंत्रिमंडल पुनर्गठन, राजनीतिक नियुक्तियां और वसुंधरा राजे की भूमिका, ये तीनों सवाल आने वाले महीनों में राजस्थान की सियासत की दिशा तय करेंगे।

















