
यदि कांग्रेस को 2028 में राजस्थान में सत्ता में वापसी करनी है, तो उसे सामाजिक और राजनीतिक संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा। राजस्थान से अबरार अहमद और अशक अली टांक के बाद कोई मुस्लिम नेता राज्यसभा में नहीं पहुंचा है, जबकि मुस्लिम मतदाता प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कांग्रेस का पारंपरिक और भरोसेमंद वोटर रहा है। राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट पर कांग्रेस का मुस्लिम सांसद नहीं है, यही कारण है कि राज्यसभा के जरिए मुस्लिम प्रतिनिधित्व कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा रहा है।
-देवेंद्र यादव-

देश के कई राज्यों में इसी वर्ष राज्यसभा की सीटें खाली हो रही हैं। इन सीटों पर कांग्रेस किसे प्रत्याशी बनाएगी, इसे लेकर पार्टी के रणनीतिकार असमंजस में हैं। स्थिति वही है एक अनार, सौ बीमार। सबसे बड़ी चुनौती राजस्थान और मध्य प्रदेश में है, जहां कांग्रेस सत्ता में नहीं है, फिर भी दोनों राज्यों से एक-एक राज्यसभा सीट जीतने की संभावना रखती है।
चर्चा है कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, दोनों ही राज्यसभा में जाना चाहते हैं। दिग्विजय सिंह वर्तमान में मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं और उनका कार्यकाल इसी वर्ष समाप्त हो रहा है। वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वे दोबारा चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन राजनीति में अंतिम फैसला वही होता है जो वक्त पर लिया जाए। हालांकि, दिग्विजय सिंह की विश्वसनीयता यह रही है कि जो कहते हैं, वह करते भी हैं। यदि दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश से राज्यसभा में न जाने का निर्णय लेते हैं, तो यह अशोक गहलोत जैसे नेताओं के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा करेगा। अशोक गहलोत फिलहाल राजस्थान विधानसभा के सदस्य हैं और अगले विधानसभा चुनाव में अभी लगभग तीन वर्ष शेष हैं। ऐसे में राज्यसभा उनके लिए सुरक्षित और रणनीतिक विकल्प माना जा रहा है।
राहुल गांधी की राजनीति का मौजूदा एजेंडा स्पष्ट है, नए, मजबूत और जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे लाना। यह लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है जब दिग्विजय सिंह और अशोक गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता पदों की लालसा से ऊपर उठकर पार्टी को दिशा देने की भूमिका निभाएं। इसी संदर्भ में दिग्विजय सिंह का फैसला राहुल गांधी की रणनीति को मजबूती दे सकता है।
यदि राजस्थान की बात करें, तो अशोक गहलोत को केवल “जादूगर” कहना अधूरा होगा; वे एक कुशल राजनीतिक बाजीगर भी रहे हैं। उनका ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने राजस्थान से उन्हीं नेताओं को राज्यसभा में पहुंचाया, जिनसे उनका सीधा या अप्रत्यक्ष राजनीतिक हित जुड़ा रहा, चाहे वे गांधी परिवार के करीबी हों या स्वयं सोनिया गांधी। इस रणनीति के जरिए उन्होंने न सिर्फ अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित रखी, बल्कि हाईकमान में अपनी उपयोगिता भी बनाए रखी।
पवन खेड़ा का उदाहरण इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। वे गांधी परिवार के निकट माने जाते हैं और एक समय यह चर्चा प्रबल थी कि उन्हें राजस्थान से राज्यसभा भेजा जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय सोनिया गांधी, प्रमोद तिवारी और मुकुल वासनिक जैसे नेताओं को राजस्थान से राज्यसभा में पहुंचाया गया। नतीजा यह रहा कि अशोक गहलोत पांच वर्ष मुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन चुनाव में कांग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी। यह सिलसिला राजस्थान में तीन बार दोहराया जा चुका है— गहलोत के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस चुनाव हारती रही है।
यह सवाल अब गंभीर है कि क्या इस बार भी वही रणनीति दोहराई जाएगी, या कांग्रेस 2028 को ध्यान में रखते हुए कुछ नया सोचेगी?
यदि कांग्रेस को 2028 में राजस्थान में सत्ता में वापसी करनी है, तो उसे सामाजिक और राजनीतिक संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा। राजस्थान से अबरार अहमद और अशक अली टांक के बाद कोई मुस्लिम नेता राज्यसभा में नहीं पहुंचा है, जबकि मुस्लिम मतदाता प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कांग्रेस का पारंपरिक और भरोसेमंद वोटर रहा है। राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट पर कांग्रेस का मुस्लिम सांसद नहीं है, यही कारण है कि राज्यसभा के जरिए मुस्लिम प्रतिनिधित्व कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा रहा है।
आज भी राजस्थान में मजबूत मुस्लिम चेहरे मौजूद हैं। राजस्थान मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष और अल्पसंख्यक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष एम.डी. चौपदार युवा, प्रभावशाली और संगठन से जुड़े नेता हैं। सवाल केवल योग्यता का नहीं, बल्कि राहुल गांधी की राजनीतिक दृष्टि का है।
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पास ऐसा कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा नहीं है, जो व्यापक स्तर पर मुस्लिम मतदाताओं को संबोधित कर सके। इसका एक कारण यह भी रहा है कि राजस्थान में मुस्लिम नेताओं को अक्सर उन विधानसभा सीटों से टिकट दिया जाता है, जहां जीत की संभावना बेहद कम होती है।
ऐसे में, यदि कांग्रेस वास्तव में 2028 की तैयारी कर रही है, तो राजस्थान से राज्यसभा में किसी मुस्लिम नेता को अवसर देना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है। राहुल गांधी की नजर किस पर इनायत होगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन यह फैसला कांग्रेस की आने वाले वर्षों की दिशा तय कर सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार है।)

















