
-संजय स्वतंत्र-
अपने लिए कुछ भी
नहीं मांगती हैं
प्रार्थना करतीं स्त्रियां कि,
वे चाहती हैं-
सुंदर हो जाए उसकी और
उसके आसपास की दुनिया
जहां हो सपनों का घर
अच्छा पति और दो प्यारे बच्चे।
प्रार्थना करतीं कुछ स्त्रियां
मांगती हैं नीला आसमान
जहां वह खुली हवा में सांस ले
और उड़ जाए चिड़िया की तरह,
उनके संग उड़ें वे स्त्रियां भी
जो घुट रही हैं अपनी दुनिया में।
प्रार्थना करतीं स्त्रियां
मांगती हैं ईश्वर से
दूर तक फैली हुई धरती
जिसकी कोख में रोप सके
अनगिनत दिव्य बीज
जिससे लहलहाती रहे फसल
सदियों तक,
भूखा न सोए कोई और
अन्न से भरी रहे रसोई।
प्रार्थना करतीं स्त्रियां
मांगती हैं हौसला
देश की हर बेटी के लिए
ताकि स्वयंसिद्धा बन
लड़ सके वह जीवन के
हर अंधकार और दमन से।
तुलसी चौरे पर
प्रार्थना करतीं स्त्रियां
मांगती हैं उम्र और सेहत
बेटे और पति के लिए,
मगर नहीं मांगती
अपने लिए कुछ भी,
सुकून न सुख की नींद
और न अपने लिए प्रेम।
घर से समाज तक
सहती रहती हैं तंज,
अकेले लड़ती हैं खुद से
करती रहती हैं दूसरों के लिए
दुआएं दिल से हमेशा,
उसकी प्रार्थना में बहुत शक्ति है
वह स्वयं रचती है संसार,
प्रार्थना करतीं स्त्रियां
इस पृथ्वी की कुशल चित्रकार हैं।
(nina srivastav अभिव्यक्ति EXPRESSION से साभार)














