
-शैलेश पाण्डेय-

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की पहचान मेरे ज़ेहन में हमेशा एक ऐसे शहर के तौर पर रही, जिसकी औद्योगिक और व्यापारिक पहचान भले ही बहुत मज़बूत न हो, लेकिन संस्कृति, साहित्य और खेल ने इसे अलग ऊँचाई दी है। मेरी भोपाल के बारे में समझ अपने ढंग के भारत भवन, दिग्गज स्क्रिप्ट राइटर सलीम खान, पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान मंसूर अली खान पटौदी, कुआलालंपुर विश्व कप में निर्णायक गोल करने वाले हॉकी दिग्गज असलम शेर खान और हिंदी के प्रमुख अख़बार दैनिक भास्कर तक सीमित थी। यह जरूर पता था कि यह भी लगभग नवाबों के शहर लखनऊ के मिज़ाज से मिलता जुलता है क्योंकि यहां भी नवाबों का शासन रहा है।
यह ज़रूर मालूम था कि यह तालाबों और झीलों का शहर है। इसके बारे में बचपन में सुनी कहावत आज भी याद है—
“तालों में ताल भोपाल का ताल, बाकी सब तलैया।” और यह कहावत यहां के तालाब देखकर चरितार्थ भी हो गई।
लेकिन यह शहर केवल तालाबों और झीलों का ही नहीं, बल्कि पहाड़ों, हरियाली और तहज़ीब का खज़ाना भी है, यह देखकर मन सचमुच चकित रह गया। असली शहर भी तो तब ही समझ आता है जब आप उससे रूब-रू होते हैं। तभी अच्छाइयाँ और कमियाँ दोनों सामने आती हैं। मुझे तो नवाबों के शहर लखनऊ से भी कहीं ज़्यादा, भोपाल का नैसर्गिक सौंदर्य और सादगी भरा माहौल अच्छा लगा। हालाँकि लखनऊ की अपनी अलग ही शान, खान पान, तहजीब और संस्कृति है।

अपने साढ़े छह दशक के जीवन में भोपाल से वास्ता हमेशा इतना ही रहा कि यह चेन्नई, हैदराबाद या बेंगलुरु से कोटा-जयपुर लौटते समय रास्ते में पड़ने वाला एक स्टेशन था, जहाँ ट्रेन कुछ ज्यादा समय रुकती है और आप प्लेटफॉर्म पर उतरकर चाय, नाश्ता और अख़बार ले सकते हैं। इस शहर में परिचितों में भी इक्का-दुक्का लोग जिनमें राजस्थान पत्रिका में कार्यकाल में सहयोगी संजय, संजना और संजीव श्रीवास्तव। लेकिन इस बार शनिवार और रविवार के 48 घंटे ने इस शहर से थोड़ा नहीं, बल्कि काफ़ी गहरा परिचय करा दिया। यह मौका मिला पारिवारिक विवाह समारोह में शामिल होने का। और यह अनुभव मन में हमेशा के लिए अंकित हो गया।
गूगल मैप ने कोटा से भोपाल की दूरी लगभग 350 किमी बताई थी। हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथी धीरेन्द्र राहुल और पुरूषोत्तम पंचोली हाल ही में भोपाल होकर लौटे थे। उन्होंने भी अच्छा रास्ता बताया था। लेकिन करीब सौ किलोमीटर का टू-लेन रास्ता, फिर उबड़-खाबड़ फोर-लेन और उस पर “कोढ़ में खाज” की तरह गाय और कुत्तों के जमघट ने सफर को कठिन और खतरनाक दोनों बना दिया। आपको सतत सचेत रहना पडता है कि कब मवेशी आपके वाहन के सामने आ जाए। हाल ही में हमारे मित्र रवि जैन को हाइवे पर कार से अचानक कुत्ते के टकराने से लगभग 80 हजार रूपए का फटका लग चुका है। उदयपुर में दुर्घटनाग्रस्त कार छोडने और वापस लेने जाने का सिरदर्द अलग हुआ। जितने समय में आप भोपाल यह दूरी तय करते हैं, उतने में आप अच्छी फोर-लेन हाइवे पर आराम से 500 किलोमीटर निकल जाते।
हमने जैसे ही राजा भोज एयरपोर्ट के पास से भोपाल में प्रवेश किया, लगा यह तो राजधानी का इलाका है इसलिए सड़कें चौड़ी होंगी। पर हैरानी तब हुई जब शहर के भीतरी इलाके तक लगभग 22 किमी की यात्रा बिना किसी जाम, बिना शोर, बिना अव्यवस्था के पार हो गई।
रास्ते में आने वाले तालाब, पहाड़, पेड़ों की कतारें, बाग-बगीचे—हर दृश्य चौंका रहा था।
मन में सवाल उठ रहा था। “किस शहर में इतनी सफ़ाई, इतना अनुशासन और इतना सुकून होता है?”
कोटा और जयपुर जैसे शहरों में तो ट्रैफिक में आपकी जान ही निकल जाती है। हमारे एक मित्र तो कहते हैं “कोटा में कार चलाने में डर लगता है। कब कौन सी बाइक, ऑटो या ई-रिक्शा कट मार दे!” यदि आपने बहस की तो गाली गलौच के अलावा आपकी पिटाई भी हो सकती है। यदि बदमाश हुए तो चाकू भी मार सकते हैं। हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिसमें वाहन भिडने पर हुई कहासुनी में चाकू मार दिया।
लेकिन भोपाल में? 48 घंटों में बस एक बार एक स्कूटी सवार युवती ने हम से आगे निकलने के लिए नियम तोड़ा। हमें न कहीं चौराहों पर पुलिसकर्मी दिखे, न हॉर्न का शोर। यहां तक कि लालबत्ती का उल्लंघन करता कोई नहीं मिला। वाहन पार्किंग भी सड़क किनारे बनी सफेद लाइनों के भीतर ही।
और सबसे अच्छी बात, सड़कें थड़ियों, ठेलों, रेहड़ियों से घिरी नहीं मिलतीं। यही इस शहर की खूबसूरती में चार चाँद लगाता है। जबकि हमारे यहां तो इसी से रास्ते जाम हैं।
विवाह वाले दिन एक सज्जन मिले—अरुण मिश्र। मैकेनिकल इंजीनियर, पर दिल से कवि।
मशीनी दुनिया छोड़ी और बैंक अधिकारी बन गए। कई शहरों में रहने के बाद जब रिटायरमेंट आया तो जगह चुनी—भोपाल।
“क्यों?”, मैंने पूछा। उनका जवाब दिल में उतर गया।
**“थोड़ा समय निकालकर दिल से इस शहर को घूमिए…
वापस जाने का मन ही नहीं करेगा।
पग-पग पर पानी से भरे तालाब,
हरियाली से ढके पहाड़,
ऐसी शांति, कहाँ मिलेगी?
जब चाहो तालाब किनारे बैठ जाओ।
मन भर जाए तो किसी बगीचे में किताब लेकर बैठो।
कोई आपको परेशान नहीं करेगा।
ट्रैफिक में भी लोग मुस्कुराकर रास्ता देते हैं।
ऐसा शहर कहाँ है?”**
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