
राहुल गांधी का संदेश साफ है, अब आराम नहीं, संघर्ष। यही बात कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी बार-बार दोहराते आए हैं “अभी नहीं तो कभी नहीं, लड़ोगे नहीं तो मिट जाओगे।” 84 वर्ष की उम्र में भी खड़गे सड़क पर उतरकर संगठन को जगाने की कोशिश कर रहे हैं।
– देवेंद्र यादव

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जिस तरह राज्यों के नेताओं को दिल्ली बुलाकर अलग-अलग बैठकें ले रहे हैं, उससे पार्टी के “आरामतलब” नेताओं को भी अब यह एहसास होने लगा है कि केवल कुर्सी संभालने से कांग्रेस मजबूत नहीं होगी। अब वक्त संघर्ष का है, मैदान में उतरने का है और जनता से जुड़ने का है।
लेकिन असली सवाल यह है कि दिल्ली में रणनीति बनाकर लौटने के बाद क्या राज्यों के कांग्रेस नेता अपने-अपने प्रदेशों में जाकर ब्लॉक और जिलों तक वही ऊर्जा दिखाते हैं? क्या वे राहुल गांधी और खड़गे के संदेश को कार्यकर्ताओं और आम जनता तक पहुंचाते हैं? दुर्भाग्य से कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि नेता जनता से दूरी बनाए रखते हैं और संगठन से निरंतर संवाद नहीं करते। नतीजा यह कि कांग्रेस चुनावी मैदान में कमजोर पड़ती जा रही है।
दिल्ली में बैठकें करना आसान है, लेकिन असली संघर्ष गांव, कस्बों, ब्लॉक और जिलों में होता है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का संदेश तब तक प्रभावी नहीं होगा, जब तक प्रदेश के नेता उसे ज़मीन पर नहीं उतारेंगे। अक्सर देखा जाता है कि नेता दिल्ली बुलावे पर तो दौड़कर चले जाते हैं, लेकिन अपने ही जिलों और ब्लॉकों में जाने से कतराते हैं। इसी वजह से जनता और कांग्रेस नेतृत्व के बीच समन्वय टूटता जा रहा है।

18 जनवरी को केरल में राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं और जनप्रतिनिधियों से साफ कहा था कि वे अधिकतम समय जनता के बीच बिताएं। संदेश देने के बाद राहुल गांधी ने खुद उसका पालन किया और सीधे अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली पहुंचे, जहां वे कार्यकर्ताओं और आम लोगों से मिले। यह उदाहरण बताता है कि नेतृत्व क्या चाहता है—कागज़ी राजनीति नहीं, ज़मीनी राजनीति।
राहुल गांधी का संदेश साफ है, अब आराम नहीं, संघर्ष। यही बात कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी बार-बार दोहराते आए हैं “अभी नहीं तो कभी नहीं, लड़ोगे नहीं तो मिट जाओगे।” 84 वर्ष की उम्र में भी खड़गे सड़क पर उतरकर संगठन को जगाने की कोशिश कर रहे हैं।
हरियाणा में नरेगा बचाओ संग्राम का आगाज इसी सोच का हिस्सा है। कांग्रेस संकेत दे रही है कि वह नरेगा को लेकर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बड़ा जन आंदोलन खड़ा करेगी और फरवरी में होने वाले संसद के बजट सत्र में भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाएगी। सवाल यह है कि क्या भाजपा किसान कानूनों की तरह नरेगा पर भी झुकने को मजबूर होगी?
राहुल गांधी और खड़गे का हरियाणा में नरेगा मजदूरों के साथ उतरना यह बताता है कि कांग्रेस आने वाले दिनों में इस संघर्ष को “महासंग्राम” में बदलना चाहती है। मगर फिर वही सवाल खड़ा होता है—क्या प्रदेश स्तर के नेता भी यही साहस दिखाएंगे? क्या वे दिल्ली से लौटकर ब्लॉक और जिलों में बैठकों का सिलसिला शुरू करेंगे या फिर रणनीति फाइलों में ही दबकर रह जाएगी?
आज कांग्रेस की असली परीक्षा दिल्ली में नहीं, बल्कि गांव-गांव, बूथ-बूथ और कार्यकर्ता-कार्यकर्ता के बीच है। यदि प्रदेश के नेता जनता से जुड़ने का साहस नहीं दिखाएंगे, तो दिल्ली की बैठकें केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी।
अब वक्त भाषणों का नहीं, संघर्ष के मैदान में उतरने का है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















