
राजनीति में संकेत छोटे होते हैं, लेकिन उनके अर्थ बड़े होते हैं।
– देवेंद्र यादव-

19 जनवरी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ केरल से लखनऊ हवाई अड्डे पर कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री सचिन पायलट की मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि इसके पीछे छिपे राजनीतिक संकेतों पर चर्चाएं तेज हो गईं। दरअसल कांग्रेस हाईकमान ने सचिन पायलट को केरल विधानसभा चुनाव के लिए मुख्य पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। 18 जनवरी को राहुल गांधी और सचिन पायलट एक साथ दिल्ली से केरल रवाना हुए थे। राहुल गांधी ने केरल दौरा पूरा करने के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली के लिए प्रस्थान किया और उसी दौरान लखनऊ में उनके साथ सचिन पायलट भी नजर आए।
✦ साथ जाना, साथ लौटना और राजनीतिक संकेत
राहुल गांधी और सचिन पायलट का एक साथ केरल जाना और फिर केरल से उत्तर प्रदेश आना राजनीतिक हलकों में सुर्खियां बन गया। सवाल उठने लगे कि क्या राहुल गांधी सचिन पायलट को कांग्रेस में राष्ट्रीय महामंत्री से भी बड़ा दायित्व सौंपने पर विचार कर रहे हैं? यह चर्चा उस समय और तेज हो गई जब 20 जनवरी को भारतीय जनता पार्टी ने 48 वर्षीय युवा नेता नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। भाजपा के इस फैसले को संगठनात्मक बदलाव और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
✦ क्या कांग्रेस भी युवा नेतृत्व पर दांव लगाएगी?
अब राजनीतिक सवाल यह है कि क्या कांग्रेस भी पार्टी की कमान किसी युवा चेहरे के हाथ में देगी? और यदि ऐसा होता है तो क्या वह चेहरा राजस्थान से लगातार दूसरी बार विधायक और पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट होंगे?
यदि तुलना करें तो भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नवीन और सचिन पायलट दोनों ही पिछड़ा वर्ग से आते हैं, लेकिन लोकप्रियता के पैमाने पर सचिन पायलट राष्ट्रीय स्तर पर कहीं अधिक पहचाने जाते हैं। पायलट को देशभर का युवा वर्ग जानता है, जबकि नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले बिहार के बाहर बहुत कम लोग जानते थे।
सचिन पायलट न केवल युवाओं में बल्कि पिछड़ी जातियों के बीच भी प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की तुलना में कहीं व्यापक है।

✦ राहुल गांधी की सोच बनाम कांग्रेस के ‘ज्ञानवीर’
पर असली प्रश्न यह है कि क्या राहुल गांधी सचिन पायलट को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा पाएंगे?
कांग्रेस के भीतर अनुभव और वरिष्ठता रखने वाले तथाकथित ‘ज्ञानवीर नेताओं’ की कोई कमी नहीं है। बीते एक दशक में बार-बार देखा गया है कि राहुल गांधी बदलाव की बात करते हैं, नई रणनीति बनाते हैं, लेकिन पार्टी के अंदर बैठे नेता उन्हें सलाहों के जाल में उलझाकर उनके ट्रैक से भटका देते हैं। राहुल गांधी लंबे समय से संगठनात्मक बदलाव की बात करते रहे हैं, लेकिन वह बदलाव जमीन पर उतरते नहीं दिखे। यदि राहुल गांधी की सोच समय पर लागू होती, तो शायद कांग्रेस लगातार राज्यों के चुनावों में पराजय नहीं झेलती।
✦ भाजपा का मॉडल और कांग्रेस की दुविधा
2014 के बाद भाजपा ने लगातार संगठन में बड़े बदलाव किए, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया और उसी का परिणाम है कि भाजपा चुनाव दर चुनाव मजबूत होती गई। वहीं कांग्रेस 2014 और 2019 की हार के बाद भी निर्णायक संगठनात्मक बदलाव नहीं कर सकी। अब भाजपा ने नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाकर फिर संकेत दिया है कि वह नेतृत्व परिवर्तन से नहीं डरती। सवाल है, क्या राहुल गांधी भी कांग्रेस में ऐसा साहसिक निर्णय लेंगे? यदि राहुल गांधी अपने आसपास के ज्ञानवीर नेताओं की सलाह से ऊपर उठकर अपने विजन पर काम करते हैं, तभी कांग्रेस में वास्तविक बदलाव संभव है। वरना कांग्रेस सिर्फ चर्चाओं में युवा नेतृत्व तलाशती रहेगी और जमीन पर हालात जस के तस बने रहेंगे।
✦ क्या सचिन पायलट होंगे कांग्रेस के अगले चेहरे?
राहुल गांधी और सचिन पायलट की हालिया सक्रियता यह जरूर बताती है कि पार्टी के भीतर कुछ बड़ा पक रहा है। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस भी भाजपा की तरह जोखिम लेकर युवा नेतृत्व को कमान सौंपती है या फिर पुराने ढर्रे पर ही चलती रहेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















