
-अमिता नीरव-
ताऊजी कहा करते थे कि जिसने एक बार पत्रकारिता कर ली, फिर वह उसे छोड़ नहीं सकता है। समझ नहीं पाती थी कि वे ऐसा क्यों कहते थे! पत्रकारिता में आने से पहले इस दुनिया के बारे में अपनी जानकारी एकदम सिफर थी।
छह महीने ट्रेनिंग के बाद जब चुनने की बारी आई तो मैं एकदम स्पष्ट थी, रिपोर्टिंग नहीं। हमारी बैच के सारे ही लड़कों ने रिपोर्टिंग चुनी थी। अब सबको रिपोर्टिंग मिल नहीं सकती, तो कुछ को मिली औऱ बाकियों को डेस्क का काम मिला।
डेस्क पर काम करने वाले लड़के कसमसाते रहते थे। खबरों में कमियाँ निकालते, यह बताते कि यदि उन्होंने इस खबर की रिपोर्टिंग की होती तो वे इसमें यह बात भी लिखते, या इस एंगल से भी खबर पर बात करते। या ये तथ्य ही गलत है। मतलब कि वे यह बताते कि हम रिपोर्टिंग के सर्वथा योग्य हैं, लेकिन हमें यह काम नहीं दिया गया। मुझे समझ नहीं आता था कि सारे ही रिपोर्टिंग क्यों चाह रहे हैं?
मैंने पूछा तो जबाव मिला, ‘रिपोर्टिंग में कॉन्टेक्ट्स बनते हैं।’ मेरे लिए ये कुछ अनूठी बात थी, ‘कॉन्टेक्ट्स बनते हैं तो क्या होता?’
‘कॉन्टेक्ट्स काम आते हैं। रिपोर्टिंग में पॉवर है।’
‘कैसे?’
‘अरे अपने कॉन्टेक्ट्स से हम काम करवा सकते हैं, अपने औऱ अपनों के…’
ये ‘पॉवर’ शब्द जहन में अटक जाता था। बाद में कई बार पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स से बातचीत का मौका मिला। जब भी मैं पूछती कि ‘पत्रकारिता क्यों?’ तो अमूमन एक ही जवाब मिलता, ‘पत्रकारिता में पॉवर है, ग्लैमर है।’
नौकरी की शुरुआत में जब ड्राइविंग लायसेंस बनने की प्रक्रिया में था, एक दिन चालान बन गया। घर आकर बताया तो मुझसे पहला सवाल ही यह पूछा गया कि ‘कहा नहीं पत्रकार हूँ!’
‘नहीं’
‘क्यों?’
‘क्योंकि यदि मैं किसी कानून का उल्लंघन करती हूँ तो क्या पत्रकार होने से वह माफ किया जाना चाहिए?’
बाद में कई दिनों तक घर-परिवार में इस घटना के संदर्भ में मेरा मजाक उड़ाया गया, लेकिन धीरे-धीरे ताऊजी के कहने और रिपोर्टिंग को लेकर पत्रकारों के ऑब्सेशन के सूत्र सुलझने लगे।
बच्चे अक्सर घर के बड़ों के जूतों को पहनकर गिरते हैं। वे अपने बड़ों की नकल करते हैं। कई बार यदि उन्हें उम्र में उनसे छोटा कोई बच्चा मिल जाता है तो वे उससे बड़ों की तरह का व्यवहार करते हैं, यदि उन्हें घर में लाड़-प्यार मिलता है तो वे उस बच्चे के साथ भी यही करेंगे, यदि डाँटा जाता है तो वे छोटे बच्चे के साथ उसी रूआब से व्यवहार करेंगे।
अमूमन हर बच्चा जल्द से जल्द बड़ा हो जाना चाहता है। यह चीज बड़ी चकित करती है कि बच्चे जल्दी-जल्दी बड़े क्यों हो जाना चाहते हैं। कुछ समय पहले एक दोस्त ने बातचीत में बताया था कि ‘जिस दिन मैं बच्चों को डाँट देता हूँ, वो दिन मेरा बेकार चला जाता है।’
मैंने पूछा, ‘क्यों?’
तो जवाब दिया, ‘मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपने बड़े होने का नाजायज फायदा उठाता हूँ। यदि मैं बड़ा नहीं होता उनसे तो क्या मैं उन्हें डाँट पाता औऱ क्या वो मेरी डाँट सह लेते।’
हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा बनाना चाहते हैं। हम भी पढ़-लिखकर बड़ा हो जाना चाहते हैं। जो जितना बड़ा है वह उससे भी बड़ा हो जाना चाहता है। उम्र में बड़ा नहीं, ओहदे में, रखूस में, पैसे में, प्रभाव में… सत्ता में।
सवाल है कि सब बड़ा होना क्यों चाहते हैं? हम सब अपने रोजमर्रा के जीवन में यह देखते हैं, कि बड़े होने से जीवन आसान हो जाता है। बड़े होने में बहुत सारी सत्ता है, ताकत है, स्वतंत्रता है, प्रभाव है। एक बच्चा जब यह देखता है कि उसे समय बाँधकर टीवी देखने दिया जाता है, जबकि घर के बड़े जब चाहे, जितना चाहे टीवी देखते हैं, तब उसे लगता है कि ऐसा इसलिए है कि क्योंकि वह छोटा है। बच्चे की समझ गलत भी नहीं होती है।
बड़े होने में शक्ति है, प्रभाव है ताकत है और है इसके साथ ही बहुत सारी सुविधाएँ और लाभ। इसीलिए हर व्यक्ति बड़ा होना चाहता है, प्रभाव, ताकत और शक्ति चाहता है। हमारी व्यवस्थाओं में छोटे-छोटे कामों के लिए किस तरह समय औऱ ऊर्जा का अपव्यय होता है, ऐसे में हरेक शक्ति चाहता है, लेकिन खराब बात यह है कि यह सिलसिला रूकता नहीं है।
हमारे बच्चों का व्यवहार दूसरों से ठीक वैसा होगा, जैसा हमारा व्यवहार बच्चे से हैं। इसका मतलब यह है कि यदि आप अपने बड़े होने से उसे डराएँगे, उस पर दबाव डालेंगे तो वह इसे बड़े होने का आवश्यक हिस्सा समझेगा। यहीं से हम बच्चे को सत्ता औऱ शक्ति के संस्कार देने लगते हैं।
आगे चलकर वह अलग-अलग तरह से इन्हीं चीजों को ग्रहण करता है। कहने का मतलब यह है कि शक्ति की प्रकृति किसी बच्चे के सामने जैसी जाएगी, वह वैसी ही आगे हस्तांतरित करेगा।
पारंपरिक समाज के मूल्यों में सामंती संस्कार अंतर्निहित हैं। हमें अपने परिवार, समाज, शैक्षिक संस्थाओं और इर्दगिर्द के पूरे परिवेश में सत्ता के वही संस्कार मिलते हैं, हम वही आगे भी बढ़ाते हैं। लोकतांत्रिक मूल्य हमारे सामूहिक डीएनए में है ही नहीं।
शक्ति, प्रभाव, सत्ता की अपनी प्रकृति सदियों से एक-सी रही है। यदि किसी के पास शक्ति है तो वह उसका दुरुपयोग करेगा ही करेगा। अनैतिक कार्य करने, अन्याय और दमन करने में उसका इस्तेमाल करेगा ही करेगा। यही प्रकृति इतिहास से हस्तांतरित होती रही है। इसलिए भी सारे संघर्षों के अंत में निराशा हासिल होती है।
काफ्का कहते हैं कि, ‘हर क्रांति के अंत में एक नेपोलियन बोनापार्ट खड़ा मिलता है।’ इतिहास बताता है कि अक्सर क्रांतियों के बाद का समाज वैसा नहीं होता है, जिस तरह के समाज की उम्मीद में क्रांति की गई थी। हर बार, बदलाव के बाद, क्रांति के बाद समाज धीरे-धीरे वही समाज हो जाता है, जिसके विरोध में क्रांति की गई थी। तो क्या बार-बार क्रांतियाँ करनी होगी?
सवाल तो यह भी है कि जब शक्ति या सत्ता की प्रकृति वही की वही रहनी है तो क्या बार-बार की क्रांतियों से वो बदल जाएगी? जब तक शक्ति के चरित्र में ही बदलाव नहीं किया जाएगा, तब तक सारी क्रांतियां निराशा में बदलती रहेगी। हमारी दिक्कत यह है कि हम अति का प्रतिकार दूसरी अति से करते हैं और फिर सोचते हैं कि व्यवस्था में परिवर्तन होगा।
दुनिया के सारे संघर्ष सत्ता को पाने, उसे बनाए रखने औऱ उसका दुरुपयोग करने के लिए हुए हैं, होते हैं और होते रहेंगे। इस तरह के संघर्षों की सफलता के बाद भी एक वर्ग सत्तासीन और एक वर्ग सत्ताहीन होगा ही। जो सत्ता की प्रकृति है, वह अन्याय की ही है तो फिर वही संघर्ष होगा। जो सत्ताहीन होगा वह सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्षरत रहेगा। मानवता के इतिहास के संघर्षों से भरा होने की एक बड़ी वजह यह भी है। मानवता के इतिहास को संघर्षों से मुक्ति तब ही मिल पाएगी, जब शक्ति के विचार में, उसकी प्रकृति में करेक्शंस के लिए पहल की जाए।
शक्ति ‘साध्य’ नहीं है उसे ‘बदलाव का साधन’ होना चाहिए।
(अमिता नीरव की फेसबुक वाल से साभार)
Advertisement

















