
– विवेक कुमार मिश्र

चाय सुबह-सुबह भर देती है
गर्माहट से,स्वाद से, और जीवन के रंग से
चाय एक हलचल सी होती है
बैठे बैठे महाआलसी को भी
कह देती है कि उठों…
अब कुछ काम-धाम करों
चाय पर आप कुछ करते हुए दिखते हैं
यह तो तय है कि चाय पीते आदमी से
कुछ काम-धाम की बातें की जा सकें
वह कुछ नहीं करेगा तो कम से कम
कार्य करने का या काम निकालने का
रास्ता ही बतलायेगा या
इतना तो कहेगा कि यह कार्य
यहां जाने से हो जाएगा
आपको एक निश्चित गति
एक उम्मीद की लाइन दे ही देगा
चाय पीता हुआ आदमी
काम का आदमी हो जाता है
आप एक नहीं हजारों काम
चाय के रंग और स्वाद में ले सकते हैं
कोई आफिस, स्कूल, कॉलेज,
विश्वविद्यालय या संस्थान नहीं दिखा
जिसके पास चाय की थड़ी न हो
जब तक चाय की थड़ियां नहीं होती
तब तक ये संस्थान गति ही नहीं करते
चाय नहीं तो किसी कार्य में मन लगता ही नहीं
अलसाया सा पड़ा रहता है आदमी
इसीलिए जहां भी आदमियों की आमद दर्ज होती है
वहां चाय की थड़ियां भी आबाद होती रहती हैं
आप कुछ करें या न करें
पर चाय की थड़ियों से
जिंदगी का कारोबार देखते चलें
– विवेक कुमार मिश्र

















