
– विवेक कुमार मिश्र-

हिंदी के अस्तित्व राग का यह पर्व एक दिनी या एक सप्ताह या एक माह तक सीमित नहीं है । न ही ऐसा होना चाहिए । वल्कि हिंदी का राग तत्त्व मन में प्रतिपल और वास्तविक कर्म राग के रूप में हो , तब जाकर हिंदी प्रेम प्रस्फुटित होता है । हिंदी हम सबकी है । क्या मजदूर , किसान , नौकरीपेशा , वकील , डॉक्टर , उद्यमी और उद्योगपति सभी तक हिंदी सेवा का विस्तार है । एक ऐसी भाषा जो सहज है और जिसे मध्य देश का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि कबीर ने ‘भाषा बहता नीर’ की उपाधि देते हुए लोक भाषा के रूप में सिद्ध किया । वह हिंदी अपने सेवा विस्तार में सभी को अपना बनाते चलती है । हिंदी के लिए अतिरिक्त कुछ नहीं करना पड़ता । क्योंकि हिंदी हमारी रगों में बहती है । हिंदी हमारे रक्त में है । हिंदी हमारे संस्कार की वह भाषा है जो जीवित संदेश से हिंदी का कर्म प्रदेश ही निर्मित नहीं करती अपितु हिंदी के माध्यम से नौकरी , रोजगार का सृजन और हिंदी स्वाभिमान व आत्मसम्मान की भाषा बन हम सबके लिए जीवन सम्मान की जीवन अभिव्यक्ति की और अपनी दुनिया को रचना समझने की जीवन भाषा के रूप में सामने आती है । हिंदी में होना यानी अपनी संभावनाओं को अपनी ताकत को टटोलना व अपने आप को पहचाना होता है ।
हिंदी , भाषा के माध्यम से अपना स्वदेश बनती है । हिंदी के लिए कहीं नहीं बाहर नहीं अपने भीतर झांकने की जरूरत है । हिंदी को किसी बाहरी तत्व से उतना नुकसान नहीं है जितना स्वयं हिंदी वालों के उसे भाव से है जो हिंदी के लोगों में हिंदी के प्रति एक सहज कमजोरी या हिंदी को किसी मजबूरी में स्वीकार करने से बनी है । ऐसे हिंदी वाले हिंदी के लिए आत्मबोध आत्म गौरव विकसित न कर हिंदी के लिए एक अरण्यरोदन करते हैं । जिससे हिंदी का काम चलने वाला नहीं है । हिंदी को हिंदी समाज का ताकत बनाने के लिए हिंदी की उस ताकत को सामने लाना होगा जो हिंदी की सहजता व सहज अभिव्यक्ति में है । जिस कारण से सब हिंदी को स्वीकार कर आगे बढ़ते हैं ।
हिंदी की इस अपार लोकप्रियता के निम्न सूत्र है –
1. हिंदी सहज ही संपर्क सूत्र आपसी संवाद और संष्रेष्य
संवेदन की भाषा है।
2. हिंदी मजदूर , किसान , श्रमिक से लेकर उद्यमी तक जीवन व्यवहार की समान भाव से समझी जाने वाली भाषा है ।
3. हिंदी में आज रोजगार सृजन की अपार संभावना है । बाजार से लेकर व्यापार तक हिंदी जीवन की सहज भाषा हैं जिसके कारण हिंदी को स्वीकार की बड़ी भाषा के रूप में देखा जाता है ।
4. हिंदी – उद्यमी , उद्योग व बाजार में समान भाव से लागू है । जिस कारण हिंदी की क्रय शक्ति बढ़ी है । जिसके कारण हिंदी की ओर समाज के अन्य अग्रणी लोग उम्मीद के साथ देख रहे हैं जो हिंदी की बड़ी ताकत को रेखांकित करता है ।
5. हिंदी मीडिया , सोशल मीडिया , फिल्म व इंटरनेट पर एक सक्षम व ताकतवर भाषा के रूप में उभर कर पिछले दशक में आई है । जिस कारण से हिंदी को एक बड़ा जनसमूह अपना मानने के लिए एक तरह से वाध्य है । आज जो भी हिंदी को स्वीकार रहा है वह उसकी ताकत के कारण ही स्वीकार रहा है ।
6. आज हिंदी नीति , राजनीति , समाज नीति और संस्कृत नीति के कारण भी केंद्र में है । हिंदी को छोड़कर या हिंदी को किनारे पर रखकर आप कहीं नहीं जा सकते । यदि आपको कुछ अच्छा करना है । कुछ बेहतर करना है तो हिंदी को न केवल अपनाना होगा बल्कि हिंदी को स्वीकार करना भी होगा ।
7. हिंदी एक प्रदेश या देश तक सीमित भाषा व्यवहार नहीं है । बल्कि हिंदी आज वैश्विक रंग में आगे बढ़ रही है । अभी G -20 के देशों की शिखर बैठक दिल्ली में हुई तो यह भी तय है कि इसके साथ हिंदी भी दुनिया भर में अपने ढ़ंग से गई । हिंदी का रूप दिन प्रतिदिन वैश्विक रंग ले रहा है । तरंगों पर सवार होकर जहां हिंदी पूरी दुनिया में पहुंच रही है वहीं हिंदी अपनी सहजता और देशज राग से भी विश्व मंच पर माध्यम बन रही है ।
8. हिंदी कीबोर्ड से लेकर इंटरनेट और तकनीकी तरंगों पर इस तरह गतिमान है कि रोज-रोज हिंदी की नई संभावनाएं सामने आ रही हैं ।
9. हिंदी को सहज रूप में पूरे देश की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है । इस हिसाब से हिंदी जन जन के स्वीकार व जनशक्ति की भाषा है । जो सहज रूप में स्वतंत्र होते हुए मानव मन को अभिव्यक्ति को अपने केंद्र में रखते हुए आगे बढ़ती है ।
इस तरह कह सकते हैं की हिंदी जन जन के मन की वह भाषा है जो जीवन व्यवहार से लेकर, साहित्य , मीडिया सिनेमा और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया माध्यमों में एक साथ शक्तिशाली रूप में अपने को प्रस्तुत करती है । इसलिए हिंदी को एक स्वाभाविक उन्नतशील भाषा के रूप में ग्राम भाषा से वैश्विक भाषा की यात्रा तक के अभियान को हमें गर्व के साथ देखने समझने की जरूरत है । इस रूप में हिंदी मानवता कि मानव मन को समझने की जरूरत है इस रूप में हिंदी मानव मन की स्वाभिमान की व रचनात्मक ऊर्जा से भरी दिन प्रतिदिन के व्यवहार की ऐसी व्यावहारिक भाषा है जिसे पूरा देश एक मन से , एक स्वर से स्वीकार करते हुए चलता है । इसके लिए हमें अलग से कुछ नहीं करना पड़ता । यह हमारे प्राणों की जन-मन की सहज भाषा है । इसे हम सभी इसी रूप में स्वीकार करते हैं ।

















