ग़ज़ल
-शकूर अनवर-
उठे तो सारे ज़माने पे छा गये हम लोग।।
गिरे तो ज़ीस्त की पस्ती* में आ गये हम लोग।।
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जो एक जिंस ए मुहब्बत* हमारी अपनी थी।
उसी को बेच के दुनिया में खा गये हम लोग।।
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हमारे आबा ओ अज्दाद* ने जो छोड़े थे।
वो नक़्श * सारे के सारे मिटा गये हम लोग।।
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हम अपने आपके दुश्मन बने हुए हैं यहाॅं।
ख़ुद अपनी राह में काॅंटे बिछा गये हम लोग।।
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नज़र में थीं कई ख़ुशहाल मंज़िलें लेकिन।
तबाहियों के किनारे पे आ गये हम लोग।।
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कहाँ से मिल गई हमको ये बिजलियों की सिफ़त।
जिधर से निकले वहीं घर जला गये हम लोग।।
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निकल के बहरे मुहब्बत* से आजकल “अनवर”।
हवस के अंधे कुएँ में समा गये हम लोग।।
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ज़ीस्त की पस्ती* ज़िन्दगी की गिरावट
जिंस ए मुहब्बत*प्रेम रूपी वस्तु
आबा ओ अज्दाद* यानी पूर्वज
नक़्श* चिन्ह निशान
सिफ़त*गुण विशेषता
बहरे मुहब्बत*प्रेम का सागर
शकूर अनवर
9460851271














