महंगाई और बेरोजगारी का नहीं कोई समाधान

sitaraman
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन। फाइल फोटो

-राजेन्द्र सिंह जादौन-

राजनीतिक दल लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान बड़े सपने दिखाते हैं। चुनावी वायदों की हवा चौतरफा चल पड़ती है। फिर सत्ता में आने पर सालाना सपना दिखाया जाता है। सालाना सपने का मतलब है कि देश या प्रदेश को चलाने के लिए पारित किया जाने वाला बजट। यह बजट शब्दों और अंको में होता है और इसे साकार रूप देना सरकार की जिम्मेदारी होती है। यह उम्मीद की जाती है कि सरकार बजट के जरिए विकास का पहिया आगे बढ़ाएगी। देश और प्रदेश में मौजूद समस्याओं का समाधान कर लोगो के जीवन को खुशहाल बनाएगी। लोग बजट के लिए आवश्यक धन टैक्स के माध्यम से सरकारी खजाने को दे ही रहे होते हैं।
बहरहाल,इस समय देश में मंहगाई और बेरोजगारी की बड़ी समस्या है। बजट में महंगाई को काबू में करने के लिए कोई योजना लाए जाने की उम्मीद भी की जाती है। पिछले 23 जुलाई को संसद में पेश किए गए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के वर्ष 2024 के बजट में निरंतर बढ़ती मंहगाई का कोई समाधान पेश नही किया गया। इसी तरह बेरोजगारी का भी कोई समाधान सीधे तौर पर पेश नही किया गया। मोदी सरकार ने वर्ष 2014 से शुरू हुए अपने पहले कार्यकाल से ही पूर्ण वेतनमान पर सरकारी नौकरी देने की नीति को समाप्त कर दिया। केंद्र सरकार खाली पदों को नहीं भर रही। सेना में चार साल की सेवा वाली अग्निवीर भर्ती की योजना इसीलिए लाई गई कि लंबे समय तक मोटी वेतन राशि न देनी पड़े। निजी क्षेत्र की जरूरत को पूरा करने वाली अप्रेंटिस योजना को बढ़ावा दिया जा रहा है। देश की पांच सौ टॉप कंपनियों को बीस लाख युवाओं को अप्रेंटिस रखने का जिम्मा बजट में सौंपा गया है। इन अप्रेंटिस को भत्ता दिया जाएगा। बाद में कंपनी नियुक्ति भी दे सकती है। कॉर्पाेरेट टैक्स को चालीस फीसदी से घटाकर पैंतीस फीसदी भी निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। इस सरकार की नीति सरकारी नौकरी देने की है ही नही। यह कौशल विकास और निजी क्षेत्र के जरिए रोजगार के अवसर पैदा करना चाहती है। लेकिन कौशल विकास और निजी क्षेत्र में रोजगार पैदा होने की रफ्तार धीमी रहेगी। ये दोनांे प्रक्रियाएं इतनी तेज नही हो सकती है कि सालाना सवा करोड़ लोगों को रोजगार मिल जाए। अर्थशास्त्री देश मे बेरोजगारी की समस्या के समाधान के लिए इतने रोजगार सालाना देने की जरूरत बता रहे है। अर्थशास्त्री ही नहीं बजट पेश करने से एक दिन पहले सरकार की ओर से पेश किए गए आर्थिक सर्वे में भी सालाना 87 लाख से अधिक रोजगार की जरूरत बताई गई थी। लेकिन सरकार ने बजट में इस जरूरत को पूरा करने के लिए कोई बड़ी योजना पेश नही की।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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