
-देवेंद्र यादव-

24 जनवरी को कांग्रेस हाईकमान ने उत्तर प्रदेश में संगठन सृजन अभियान के तहत राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की घोषणा की। मकसद था,उत्तर प्रदेश में लंबे समय से जर्जर पड़े कांग्रेस संगठन को फिर से खड़ा करना। लेकिन इसी दिन उत्तर प्रदेश कांग्रेस को एक बड़ा राजनीतिक झटका भी लगा। कांग्रेस का प्रमुख मुस्लिम चेहरा, पूर्व मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने पार्टी की सदस्यता त्याग दी। यह महज एक इस्तीफा नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस की सांसों पर पड़ा एक और दबाव है।
उत्तर प्रदेश वह राज्य है जहां कांग्रेस लगभग चार दशक से सत्ता से बाहर है। बीते एक दशक से राहुल गांधी व्यक्तिगत तौर पर प्रयास कर रहे हैं कि कांग्रेस यहां फिर से खड़ी हो। कारण भी साफ है,उत्तर प्रदेश गांधी परिवार का पारंपरिक राजनीतिक क्षेत्र रहा है, जहां से नेहरू-गांधी परिवार लोकसभा का प्रतिनिधित्व करता आया है। राहुल गांधी खुद जानते हैं कि जब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मजबूत नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकती।
इसी चिंता के चलते संगठन सृजन अभियान की शुरुआत भी उत्तर प्रदेश से की गई। सबसे पहले जिला अध्यक्षों की घोषणा यहीं हुई, लेकिन वह घोषणा ही विवादों में घिर गई। कार्यकर्ताओं ने पारदर्शिता पर सवाल उठाए, गुटबाजी खुलकर सामने आई और कई जिलों में असंतोष भड़क उठा। अब 24 जनवरी को दोबारा जिला पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कर हाईकमान ने संदेश दिया है कि प्रक्रिया फिर से दुरुस्त की जाएगी।
सवाल यह है, क्या उत्तर प्रदेश में नए जिला अध्यक्ष घोषित होंगे? क्या राष्ट्रीय प्रभारी अविनाश पांडे और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय वह प्रदेश कांग्रेस कमेटी घोषित कर पाएंगे जो महीनों से अटकी पड़ी है? लेकिन संगठनात्मक कवायद से भी बड़ा संकट नेतृत्व का है।
राहुल गांधी पिछले दस वर्षों से उत्तर प्रदेश में नए चेहरे खोजने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस न तो नए नेतृत्व को खड़ा कर पाई और न ही अपने पुराने मजबूत चेहरों को बचा सकी। यही विडंबना है कि कांग्रेस यहां सिर्फ संगठन नहीं खो रही, बल्कि भरोसेमंद नेता भी गंवा रही है।
मैं पहले भी लिख चुका हूं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस केवल सांस ले रही है और उस सांस के लिए उसे मुस्लिम समर्थन की ऑक्सीजन मिलती रही है। अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे बड़े मुस्लिम चेहरे के जाने के बाद सवाल उठता है, क्या कांग्रेस की ऑक्सीजन ट्यूब निकल रही है?
उत्तर प्रदेश में पहले ही बहुजन समाज पार्टी मुस्लिम राजनीतिक स्पेस को सीमित कर चुकी है। ऐसे में अगर कांग्रेस अपने प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं को भी खोती चली गई, तो पार्टी के लिए सांस लेना भी कठिन हो जाएगा।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस क्यों छोड़ी, इसका उत्तर वे खुद बेहतर जानते होंगे, लेकिन संकेत साफ हैं—उपेक्षा। 20 जनवरी को जब राहुल गांधी रायबरेली आए, तब लखनऊ एयरपोर्ट पर मौजूद होने के बावजूद नसीमुद्दीन सिद्दीकी को उनसे मिलने नहीं दिया गया। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि यह उस मानसिकता को दर्शाती है जिसमें राज्य के वरिष्ठ नेताओं को नेतृत्व से दूर रखा जा रहा है।
यही दृश्य पहले बिहार में भी दिखा था, जब वहां के बड़े कांग्रेसी नेताओं को राहुल गांधी से मिलने नहीं दिया जा रहा था। तब भी सवाल उठा था, वे कौन लोग हैं जो राहुल गांधी के आसपास घेरा बनाकर स्थानीय मजबूत नेताओं को दूर रखते हैं?
क्या उत्तर प्रदेश में भी वही मॉडल लागू किया जा रहा है?
राहुल गांधी को यह खुद देखना होगा कि किसी राज्य में कांग्रेस के मजबूत और वफादार नेता कौन हैं। जब वे वहां जाएं तो उनकी नजर उन्हें ढूंढे। अगर वे सामने नहीं दिखें तो सवाल किया जाए, वे यहां क्यों नहीं हैं?
इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यही थी। वे अपने नेताओं को पहचानते थे, उन्हें नजर में रखते थे और उपेक्षा को तुरंत पकड़ लेते थे। राहुल गांधी को भी अपने इर्द-गिर्द मौजूद चापलूस नेताओं की आंखों से संगठन नहीं देखना चाहिए, बल्कि अपनी राजनीतिक दृष्टि खुद विकसित करनी होगी।
आज स्थिति यह है कि राहुल गांधी न नई टीम बना पा रहे हैं और न पुरानी टीम को बचा पा रहे हैं। नतीजा यह है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस धीरे-धीरे संगठन सृजन से ज्यादा संगठन विसर्जन की ओर बढ़ती दिख रही है।
अगर यही सिलसिला जारी रहा, तो सवाल सिर्फ सत्ता वापसी का नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के राजनीतिक अस्तित्व का बन जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















