कैलाश मेघवाल का गुस्सा कहां राहत बनकर बरसेगा!

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अब सवाल उठने लगे हैं कि प्रदेश भाजपा पर सीधा हमला बोल रहे कैलाश मेघवाल की असल में क्या मंशा है? उनका अगला राजनीतिक कदम क्या होगा? क्या वे सिर्फ अपनी हताशा प्रकट कर रहे हैं या उनकी कोई और राजनीतिक महत्वाकांक्षा है? भाजपा के साथ सुलह के आसार अब नजर नहीं आते।

-कलह कहीं बिगाड़ न दे भाजपा की चुनावी लय

-द ओपिनियन-

पांच साल बाद राजस्थान में सत्ता में वापसी के प्रयासों में जुटी भाजपा लगता है अब खुद अंतर्कलह में फंसती जा रही है। इस बार कलह का मोर्चा पार्टी के ही एक वरिष्ठ नेता कैलाश मेघावल ने खोला है। उन्होंने केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया तो कैलाश मेघवाल और खुलकर सामने आ गए। पार्टी ने भी बात बिगड़ते देख कड़ा फैसला करने में देर नहीं लगाई और मेघवाल को पार्टी की सदस्यता से निलंबित कर दिया। कैलाश मेघवाल ने भी अपने जवाब को गोपनीय नहीं रखा। मीडिया के सामने बात रखी और बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है और सारी बातें पत्र में कही गई हैं। उन्होंने केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल के खिलाफ फिर अपने आरोप दोहराएं हैं। हालांकि अर्जुनराम मेघवाल सारे आरोपों को खारिज कर चुके हैं। वह एक एक कर सभी आरोपों को नकार चुके हैं, लेकिन इतना तो साफ है कि अब सुलह की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती। कैलाश मेघवाल पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी माने जाते हैं। इसलिए उनके इन तेवरों को लेकर पार्टी और पार्टी के बाहर राजनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलें व कयास शुरू हो गए हैं। वह मीडिया से रूबरू होने के दौरान भाजपा से भी काफी खफा नजर आए। वह कहते हैं, मैं हीरो था, पार्टी ने मुझे हीरो से जीरो बना दिया। वह यहीं नहीं रूके। उन्होंने पार्टी के अंदर वसुंधरा राजे का अपमान होने की बात भी कही। इसलिए अब सवाल उठने लगे हैं कि प्रदेश भाजपा पर सीधा हमला बोल रहे कैलाश मेघवाल की असल में क्या मंशा है? उनका अगला राजनीतिक कदम क्या होगा? क्या वे सिर्फ अपनी हताशा प्रकट कर रहे हैं या उनकी कोई और राजनीतिक महत्वाकांक्षा है? भाजपा के साथ सुलह के आसार अब नजर नहीं आते। कैलाश मेघवाल और अर्जुनराम मेघवाल दोनों ही अनुसूचित जाति से आते हैं और एक ही बिरादरी के होेने के साथ पार्टी के लिए बड़ा चेहरा हैं। इसके बावजूद दोनों नेताओं के बीच यह बढ़ती दूरी इस मुकाम पर पहुंच गई है कि चुनावों में पार्टी को सियासी खामियाजा उठाना पड़ सकता है। ऐसे समय पर जबकि भाजपा पार्टी के बाहर के लोगों को पार्टी से जोड़ने में जुटी है, अपने ही लोग पार्टी में मोर्चा खोलकर बैठ गए। लेकिन पार्टी ने भी कड़ा रुख दिया है। निलंबन से यह बात साफ हो गई है कि वह अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करेगी और कांग्रेस की तरह किसी मामले को लटकाए रखने में उसका विश्वास नहीं है। अब आगे क्या? कैलाश मेघवाल ने तो साफ कर दिया है कि वह चुनाव लड़ेंगे और भाजपा के प्रत्याशी को हजारों वोटों से हराएंगे। अब सवाल उठ रहा है कि वे चुनाव मैदान में उतरने से पहले किसी अन्य पार्टी का दामन थामेंगे या अपने बूते पर निर्दलीय ही चुनाव मैदान में ताल ठोकेंगे। राजनीतिक विश्लेषक अब इस हवा का रुख भी भांपने में लगे हैं कि क्या मेघवाल कांग्रेस के साथ चले जाएंगे। वे कहते हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ कैलाश मेघवाल के अच्छे रिश्ते हैं। फिलहाल कैलाश मेघवाल का अगला सियासी कदम अभी सामने आना शेष है लेकिन अब देखना यह है कि जाट, दलित व आदिवासियों का बड़ा वोट बैंक साधने में जुटी भाजपा इस सियासी घाटे से कैसे उबरती है। कैलाश मेघवाल बार बार यह दावा कर रहे हैं कि
उनके पास भ्रष्टाचार के कई सूबत हैं। यानी उन्होंने विपक्ष को एक मुद्दा थमा दिया है। अर्जुनराम मेघवाल के पास राज्य में बड़ी चुनावी दावेदारी है ऐसे में वे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर विपक्ष के निशाने पर रहेंगे। कैलाश मेघवाल ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी को आयातित नेता करार दे दिया। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ को लेकर भी तंज कसा कि वह जनता पार्टी से आए हैं। दोनों का ही जनसंघ और पार्टी की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। साफ है कैलाश मेघवाल के तेवर अब बागी नेता जैसे हैं और उनका यह रुख भाजपा के सुलह के द्वार बंदकर देता है। देखना है अब आगे क्या होता है?

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