
उत्तर प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी और नारायण दत्त तिवारी, मध्य प्रदेश में शुक्ला बंधु और मोतीलाल बोरा, राजस्थान में हरदेव जोशी तथा बिहार में जगन्नाथ मिश्र जैसे नेताओं की राजनीतिक पकड़ और सामाजिक स्वीकार्यता के कारण कांग्रेस लगातार विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मजबूत प्रदर्शन करती थी।
-देवेन्द्र यादव-

लंबे समय से कांग्रेस पार्टी के भीतर राष्ट्रीय स्तर पर और विशेषकर हिंदी पट्टी के राज्यों में मजबूत ब्राह्मण नेतृत्व का अभाव महसूस किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राजनीतिक राज्यों में कांग्रेस की कमजोरी का एक बड़ा कारण यही रहा है कि वहां पार्टी ऐसे प्रभावशाली ब्राह्मण नेताओं को खड़ा नहीं कर पाई, जो सामाजिक और राजनीतिक रूप से समुदाय को पार्टी से जोड़ सकें।
अगर कांग्रेस के सुनहरे इतिहास पर नजर डालें तो एक दौर था जब हिंदी पट्टी में ब्राह्मण नेतृत्व कांग्रेस की रीढ़ हुआ करता था। उत्तर प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी और नारायण दत्त तिवारी, मध्य प्रदेश में शुक्ला बंधु और मोतीलाल बोरा, राजस्थान में हरदेव जोशी तथा बिहार में जगन्नाथ मिश्र जैसे नेताओं की राजनीतिक पकड़ और सामाजिक स्वीकार्यता के कारण कांग्रेस लगातार विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मजबूत प्रदर्शन करती थी।
लेकिन जैसे-जैसे ये नेता राजनीति से हटते गए या दुनिया से चले गए, वैसे-वैसे इन राज्यों में कांग्रेस कमजोर होती चली गई। आज स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस सत्ता तक पहुंचने की स्थिति में भी नहीं दिखाई देती।
राजस्थान अपेक्षाकृत अलग उदाहरण है। वहां कांग्रेस आज भी अन्य हिंदी पट्टी राज्यों से ज्यादा मजबूत नजर आती है। इसकी एक वजह यह भी है कि पार्टी के पास अभी भी सामाजिक रूप से स्वीकार्य ब्राह्मण नेतृत्व मौजूद है। वहीं उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में या तो ऐसे चेहरे नहीं हैं, या फिर पार्टी उन्हें राजनीतिक रूप से मजबूत नहीं कर पाई।
इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय का नाम महत्वपूर्ण हो जाता है। अजय राय उस राज्य से प्रदेश अध्यक्ष हैं, जो देश की राजनीति की दिशा तय करता है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लगभग चार दशकों से सत्ता से बाहर है, और ऐसे समय में पार्टी को सामाजिक संतुलन के साथ नए राजनीतिक प्रयोग करने की जरूरत है।
अजय राय लगातार ब्राह्मण समुदाय को कांग्रेस से फिर जोड़ने की कोशिश करते दिख रहे हैं। उनका प्रयास यह संदेश देने का है कि कांग्रेस केवल दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग की पार्टी नहीं है, बल्कि वह समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है। उत्तर प्रदेश से यह संदेश पूरे देश में जा सकता है कि कांग्रेस सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ना चाहती है।
दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय का एक वर्ग मौजूदा सत्ताधारी भाजपा से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आता। ऐसे में अजय राय मंदिरों से जुड़े मुद्दों पर हो, शंकराचार्य के अपमान का सवाल हो या सामाजिक सम्मान की बात—इन विषयों को मजबूती से उठा रहे हैं। बनारस जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उनकी सक्रियता राजनीतिक संकेत देती है।
कांग्रेस के लिए यह बड़ा अवसर है कि वह ब्राह्मण मतदाताओं की वापसी की रणनीति बनाए। लेकिन इसके लिए सिर्फ प्रदेश स्तर पर नहीं, बल्कि हिंदी पट्टी से किसी ब्राह्मण नेता को राष्ट्रीय स्तर पर भी खड़ा करना होगा।
उत्तर प्रदेश गांधी परिवार का पारंपरिक राजनीतिक गढ़ रहा है। रायबरेली से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सांसद हैं और अमेठी लंबे समय तक गांधी परिवार की पहचान रहा है। इतिहास गवाह है कि गांधी परिवार की उत्तर प्रदेश में मौजूदगी ने ही कांग्रेस को कई बड़े ब्राह्मण नेता दिए। मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को भी राहुल गांधी ने ही यह जिम्मेदारी सौंपी है।
अब सवाल यह है कि क्या अजय राय सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष तक सीमित रहेंगे या कांग्रेस उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में विकसित करेगी? अगर कांग्रेस सच में हिंदी पट्टी में वापसी चाहती है, तो उसे सामाजिक नेतृत्व के नए केंद्र बनाने होंगे और अजय राय इस दिशा में एक संभावित विकल्प बन सकते हैं।
कांग्रेस के लिए यह समय सिर्फ चुनावी रणनीति का नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और नेतृत्व निर्माण का भी है। अजय राय उस प्रयोग का हिस्सा बन सकते हैं—अगर पार्टी उन्हें अवसर, संसाधन और राजनीतिक समर्थन दे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















