AIMIM का उभार: कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी, भाजपा के लिए सियासी राहत

महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में AIMIM को मिली कामयाबी भले ही असदुद्दीन ओवैसी के लिए राजनीतिक विस्तार का संकेत हो, लेकिन इसकी सबसे बड़ी लाभार्थी भारतीय जनता पार्टी दिखाई देती है। कारण साफ है—यह जीत कांग्रेस और विपक्षी दलों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध का संकेत देती है।

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photo courtesy social media

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में AIMIM को मिली कामयाबी जितनी खुशगवार असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी के लिए नहीं रही, उससे कहीं अधिक राहत भारतीय जनता पार्टी को देती नजर आई। कारण वही पुराना है, विपक्षी वोटों का बंटवारा। जिस तरह एक समय बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस के पारंपरिक दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़कर कांग्रेस को कमजोर किया, क्या अब वही प्रक्रिया मुस्लिम मतदाताओं के साथ दोहराई जा रही है?

कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल

यह कांग्रेस के लिए केवल चुनावी नुकसान नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। क्या कांग्रेस पहले दलितों को और अब मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट रखने में असफल रही? जिस तरह दलितों ने मायावती के रूप में अपना अलग नेतृत्व चुना, उसी तरह बिहार विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र निकाय चुनाव में मुस्लिम मतदाता असदुद्दीन ओवैसी और AIMIM को अपना नेता और अपनी पार्टी मानते दिखाई दे रहे हैं। अक्सर राजनीतिक पंडित यह विश्लेषण करते हैं कि किसी राज्य के चुनाव का असर केंद्र और आने वाले चुनावों पर क्या पड़ेगा। इसी कड़ी में सवाल उठता है, क्या महाराष्ट्र निकाय चुनाव का असर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा? इसके संकेत अभी से दिखने लगे हैं।

उत्तर प्रदेश: सबसे बड़ी परीक्षा

उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और कांग्रेस लगभग चार दशक से सत्ता से बाहर है। कांग्रेस की राजनीतिक मौजूदगी का बड़ा आधार मुस्लिम मतदाता रहे हैं। लेकिन बिहार और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम बताते हैं कि यदि AIMIM उत्तर प्रदेश में मजबूती से उतरी, तो यह कांग्रेस ही नहीं, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर सकती है। इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा। अगर असदुद्दीन ओवैसी का यह राजनीतिक ट्रेंड जारी रहा, तो इसका नुकसान कांग्रेस, मायावती और अखिलेश यादव को 2029 के लोकसभा चुनाव में भी उठाना पड़ सकता है। विपक्ष का बिखराव भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।

‘बी टीम’ कहने की राजनीति और उसका जवाब

दिलचस्प तथ्य यह है कि महागठबंधन के कई नेता लंबे समय तक ओवैसी और AIMIM को भाजपा की ‘बी टीम’ बताते रहे। लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र निकाय चुनावों ने दिखा दिया कि यह नजरअंदाजी कितनी भारी पड़ सकती है। बिहार में महागठबंधन से सीटें न मिलने पर ओवैसी ने अपने दम पर छह सीटें जीत लीं और महागठबंधन सत्ता से दूर रह गया।

अखिलेश यादव के सामने रणनीतिक चुनौती

महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए चेतावनी हैं। सवाल है—क्या वे तेजस्वी यादव जैसी गलती दोहराएंगे या उत्तर प्रदेश में एक व्यापक गठबंधन की मिसाल कायम करेंगे, जिसमें मायावती और ओवैसी भी शामिल हों? या फिर ‘बी टीम’ का आरोप लगाकर अपने लिए मुश्किलें बढ़ाएंगे? 2029 के आम चुनाव की तस्वीर काफी हद तक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से साफ होगी। यदि कांग्रेस, सपा, बसपा और AIMIM के बीच समझौता नहीं होता है, तो उसका परिणाम क्या होगा और यदि समझौता होता है, तो सत्ता संतुलन कैसे बदलेगा,यह उत्तर प्रदेश तय करेगा।

अमित शाह की संभावित रणनीति

कुल मिलाकर AIMIM का उभार कांग्रेस के लिए राजनीतिक चिंता का विषय है और भाजपा के लिए खुशी की वजह। यदि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, मायावती और ओवैसी के साथ गठबंधन नहीं कर पातीं, तो भाजपा की रणनीति साफ हो सकती है—मायावती और ओवैसी को अलग या साथ लड़ने देना, ताकि विपक्षी वोट बंटें और सत्ता भाजपा के पास बनी रहे।

निष्कर्ष: बदलते समीकरण, नई राजनीति

असदुद्दीन ओवैसी और AIMIM का उभार भारतीय राजनीति में नए समीकरण गढ़ रहा है। यह उभार कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक के लिए चुनौती है और भाजपा के लिए एक सुनहरा राजनीतिक अवसर, जिसका असर आने वाले वर्षों में और गहराता नजर आ सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं)

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