अविश्वास प्रस्ताव के बहाने सियासत की असली चाल!

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photo courtesy social media
यह मामला केवल “बिरला रहेंगे या जाएंगे” तक सीमित नहीं है। यह विपक्ष की एकजुटता, क्षेत्रीय दलों की रणनीति और भाजपा की आंतरिक प्राथमिकताओं का जटिल समीकरण है। फिलहाल संकेत यही हैं कि बिरला की स्थिति धनखड़ जैसी नहीं है। राजनीति में संभावनाएँ कभी शून्य नहीं होतीं, पर परिस्थितियाँ अभी बदलाव की ओर इशारा नहीं करतीं।

✍ देवेंद्र यादव

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच चल रही व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। लेकिन दिलचस्प यह है कि चर्चा प्रस्ताव से ज्यादा इस बात पर हो रही है कि 14 दिन बाद बिरला का क्या होगा। क्या उनका भी वही अंजाम होगा जो पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का हुआ था?
राजनीतिक तुलना आकर्षक हो सकती है, पर यथार्थ अलग है। धनखड़ उपराष्ट्रपति थे, संवैधानिक रूप से अलग पद और राजनीतिक समीकरण भी भिन्न। वे भाजपा के मूल संगठनात्मक ढांचे से नहीं निकले थे। इसके विपरीत ओम बिरला भाजपा के दीर्घकालिक, संगठन-निष्ठ नेता हैं और लगातार दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष बने हैं। पार्टी ऐसे व्यक्ति को अस्थिर करने का जोखिम क्यों लेगी, यह बड़ा प्रश्न है।
अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के हस्ताक्षर न होना संकेत देता है कि विपक्ष एकजुट दिखाई जरूर देना चाहता है, पर भीतर रणनीतिक दूरी भी कायम है। खासकर तृणमूल कांग्रेस का तीन दिन का ‘वेट एंड वॉच’ रुख केवल संसदीय व्यवहार से जुड़ा नहीं लगता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव समीप हैं, SIR की प्रक्रिया चल रही है, और केंद्र-राज्य संबंधों की संवेदनशीलता किसी से छिपी नहीं। ऐसे में ममता बनर्जी का हर कदम चुनावी गणित से जुड़ा होगा।
यह भी संभव है कि यह प्रस्ताव कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक परीक्षण हो. इंडिया गठबंधन में वास्तविक समर्थन की पड़ताल। कौन दल खुलकर साथ आता है और कौन परिस्थिति देखकर कदम बढ़ाता है, इससे 2026-27 की राजनीति की दिशा तय हो सकती है।
ओम बिरला द्वारा प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान स्वयं पीठासीन न रहने का संकेत संसदीय शालीनता की दृष्टि से सकारात्मक माना जा रहा है। इससे वे निष्पक्षता का संदेश देना चाहते हैं। वहीं, उनकी अनुपस्थिति में राहुल गांधी को बोलने का पर्याप्त अवसर मिलना यह दर्शाता है कि संसदीय बहस का मंच अभी भी खुला है।
इस पूरे घटनाक्रम से कांग्रेस को भी यह स्पष्ट होगा कि ‘इंडिया गठबंधन’ में वास्तव में उसके साथ कौन-कौन से दल मजबूती से खड़े हैं और कौन रणनीतिक दूरी बना रहे हैं। बुधवार को ओम बिरला की गैरमौजूदगी में लोकसभा में राहुल गांधी ने भाजपा सरकार की नीतियों पर जोरदार हमला बोला। उस समय पीठासीन अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने उन्हें पूरा अवसर दिया और राहुल गांधी खुलकर अपनी बात रख सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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