
वर्तमान परिदृश्य में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संसद के भीतर भाजपा का आक्रामक रुख अनजाने में राहुल गांधी को अधिक दृश्यमान और मुखर बना रहा है। पर अंतिम निर्णायक कारक वही होगा निरंतरता, रणनीति और जनसंपर्क।
-देवेंद्र यादव-

भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या और निशिकांत दुबे के हालिया बयानों के बाद संसद की बहस ने नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। घटनाक्रम ऐसा बना कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जनता के बीच अपनी बात अधिक आक्रामक तरीके से रखने का अवसर मिल गया।
संसद में तेजस्वी सूर्य द्वारा पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए जाने के बाद राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख एम एम नरवणे की पुस्तक का उल्लेख करने की कोशिश की। जब वे नरवणे की किताब का जिक्र कर रहे थे, तब लोकसभा अध्यक्ष और सत्ता पक्ष के सदस्यों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि उनका मूल इरादा पुस्तक का उल्लेख करने का नहीं था, लेकिन जब कांग्रेस सरकार पर प्रश्न उठाए गए तो उन्हें अपनी बात रखनी जरूरी लगी।
संसद के भीतर वे विस्तार से बात नहीं कर पाए, लेकिन बाहर मीडिया के सामने उन्होंने नरवणे की पुस्तक हाथ में लेकर अपनी बात दोहराई। इसी बीच निशिकांत दुबे ने नेहरू और इंदिरा गांधी से संबंधित पुस्तकों का हवाला देते हुए टिप्पणी की और राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त करने का प्रस्ताव उठाने की बात कही। इसके जवाब में राहुल गांधी ने वीडियो संदेश जारी कर कहा कि वे किसी भी दबाव से डरने वाले नहीं हैं और अपनी बात से पीछे नहीं हटेंगे।
इसी घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया। साथ ही, राहुल गांधी ने किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और अमेरिका के साथ संभावित ट्रेड डील जैसे मुद्दों पर चर्चा की। इससे यह संकेत मिला कि वे संसद के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर सक्रिय रहना चाहते हैं।
अब सभी की नजर बजट सत्र के अगले चरण पर है। विशेषाधिकार हनन का मुद्दा आगे बढ़ता है या नहीं, अविश्वास प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाया जाता है, और इन घटनाओं का राजनीतिक असर क्या होगा—यह देखना बाकी है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि क्या भाजपा के तीखे हमले अनजाने में राहुल गांधी को अधिक मुखर और केंद्र में ला रहे हैं। साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या वे विपक्ष के सर्वमान्य नेता के रूप में उभर रहे हैं और 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता की भूमिका निभा पाएंगे।
फिलहाल स्थिति यह संकेत देती है कि आने वाले सत्र में टकराव की संभावना बनी रहेगी। राहुल गांधी की आगे की रणनीति और सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया ही तय करेगी कि यह राजनीतिक बहस किस दिशा में जाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















