
सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बजट सत्र के अगले चरण में राहुल गांधी और कांग्रेस किस रणनीति के साथ आगे बढ़ेंगे। क्या वे आक्रामकता को और धार देंगे? क्या वे किसानों, युवाओं और आर्थिक मुद्दों को केंद्र में रखकर व्यापक राजनीतिक विमर्श तैयार करेंगे?
-देवेंद्र यादव-

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के खिलाफ असाधारण आक्रामकता के साथ सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। संसद से लेकर सड़क तक उनकी मौजूदगी लगातार दर्ज हो रही है। विशेष बात यह रही कि पूरे बजट सत्र के दौरान वे दिल्ली में डटे रहे और हर मुद्दे पर मुखर रहे। राजनीतिक हलकों में अक्सर यह चर्चा होती रही है कि महत्वपूर्ण मौकों पर राहुल गांधी देश या दिल्ली से बाहर चले जाते हैं, लेकिन इस बार उनका रुख अलग रहा। स्थिर, मुखर और टकरावपूर्ण।
ताकत का स्रोत: संगठनात्मक संदेश या राजनीतिक रणनीति?
प्रश्न उठता है कि राहुल गांधी को यह राजनीतिक ऊर्जा और आत्मविश्वास आखिर मिला कहां से? इसका उत्तर संभवतः कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के उस स्पष्ट संदेश में छिपा है, जिसमें उन्होंने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से भाजपा सरकार को हटाने के लिए “करो या मरो” की नीति अपनाने का आह्वान किया था।
हालांकि यह कहना कठिन है कि संगठन के प्रत्येक स्तर पर इस संदेश को कितना आत्मसात किया गया, लेकिन राहुल गांधी के हालिया तेवर यह संकेत देते हैं कि उन्होंने इस राजनीतिक आह्वान को गंभीरता से लिया है। वे सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि वे अपनी बात से पीछे नहीं हटेंगे, चाहे उन्हें जेल जाना पड़े या संसद सदस्यता का नुकसान उठाना पड़े। उनका यह कथन उन्हें एक संघर्षशील विपक्षी नेता की छवि देता है, जो टकराव से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
नीतिगत सवालों पर सक्रियता: किसानों से संवाद
राहुल गांधी ने हाल ही में किसानों के प्रतिनिधियों से अमेरिका के साथ संभावित ट्रेड डील को लेकर चर्चा की। उन्होंने जानने का प्रयास किया कि इस समझौते से भारतीय किसानों को क्या लाभ या हानि हो सकती है। यह कदम केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि नीतिगत मुद्दों पर प्रत्यक्ष संवाद की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस आने वाले समय में आर्थिक और कृषि नीति के प्रश्नों को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना सकती है।
संसद में अगली परीक्षा: अविश्वास प्रस्ताव
संसद के बजट सत्र के अगले चरण में कांग्रेस और विपक्ष की रणनीति क्या होगी, इस पर सबकी नजर है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा संभावित है। राजनीतिक संकेत तब और मजबूत हुए जब ओम बिरला स्वयं स्पीकर के आसन पर नहीं बैठे। यदि इस प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो यह सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव का नया अध्याय खोल सकता है।
क्या भाजपा से ही मिल रही है राजनीतिक ऊर्जा?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी की आक्रामकता को अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की रणनीतियां ही बल दे रही हैं? कई बार सत्ताधारी दल के तीखे हमले विपक्षी नेता को राजनीतिक रूप से मजबूत कर देते हैं। साथ ही, राहुल गांधी को जो वैचारिक और मनोवैज्ञानिक समर्थन मिल रहा है, उसमें कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्ष 2004 से पहले कांग्रेस की स्थिति लगभग आज जैसी ही कमजोर मानी जा रही थी, लेकिन सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने पुनर्गठन किया और 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को पराजित कर सत्ता में वापसी की।
इतिहास यह संकेत देता है कि राजनीतिक पुनरुत्थान असंभव नहीं होता, यदि नेतृत्व दृढ़ और रणनीति स्पष्ट हो।
आगे की राह
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बजट सत्र के अगले चरण में राहुल गांधी और कांग्रेस किस रणनीति के साथ आगे बढ़ेंगे। क्या वे आक्रामकता को और धार देंगे? क्या वे किसानों, युवाओं और आर्थिक मुद्दों को केंद्र में रखकर व्यापक राजनीतिक विमर्श तैयार करेंगे?
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राहुल गांधी ने टकराव की राजनीति से पीछे हटने के बजाय उसे स्वीकार किया है। यह रणनीति उन्हें कितना राजनीतिक लाभ दिलाएगी, इसका निर्णय आने वाले महीनों की संसदीय और राजनीतिक घटनाएं करेंगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















