
-नेतृत्व सृजन या पैगाम-ए-मोहब्बत
-देवेंद्र यादव-

जयपुर में 14, 15 और 16 फरवरी तीन दिन, दो कार्यक्रम और एक बड़ा सवाल। सवाल सिर्फ यह नहीं कि राजस्थान से कांग्रेस का अगला राज्यसभा सांसद कौन होगा, बल्कि यह भी कि कांग्रेस किस तरह का राजनीतिक संदेश देना चाहती है। नेतृत्व सृजन या पैगाम-ए-मोहब्बत—दोनों के पीछे संकेत हैं, रणनीति है और दिल्ली तक जाती एक अदृश्य रेखा है।
राजस्थान महिला कांग्रेस का दो दिवसीय नेतृत्व सृजन प्रशिक्षण शिविर औपचारिक रूप से महिला नेतृत्व के निर्माण के लिए था, लेकिन राजनीति में मंच जितना अहम होता है, उतना ही अहम होता है मंच पर कौन। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे पवन खेड़ा। राजस्थान से होने के बावजूद खेड़ा का अब तक राज्य की जमीनी राजनीति में सक्रिय न दिखना, और अचानक बढ़ी मौजूदगी, यह अपने आप में एक राजनीतिक संकेत है। पार्टी गलियारों में चर्चा है कि खेड़ा राजस्थान से राज्यसभा का रास्ता तलाश रहे हैं। यह भी पहली बार था जब वे राजस्थान महिला कांग्रेस के किसी कार्यक्रम में इस भूमिका में दिखे। सवाल उठता है कि क्या महिला कांग्रेस का मंच राज्यसभा का प्रवेश द्वार बन सकता है?
बिहार की याद और सावधानी का सबक
इस बहस के बीच बिहार की याद आना स्वाभाविक है। विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में जिस तरह अलका लांबा और पवन खेड़ा सक्रिय थे, वह किसी से छुपा नहीं। महीनों की सक्रियता के बावजूद नतीजे कांग्रेस के पक्ष में नहीं आए। बिहार महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष को टिकट तक न मिल पाना और संगठनात्मक खींचतान, ये सब आज भी दिल्ली के रणनीतिकारों के ज़ेहन में हैं। इसलिए सवाल यह है कि क्या हाईकमान वही प्रयोग राजस्थान में दोहराएगा?
16 फरवरी: पैगाम-ए-मोहब्बत और सियासी ताकत
16 फरवरी को कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग, राजस्थान का पैगाम-ए-मोहब्बत कार्यक्रम एक अलग ही तस्वीर पेश करता है। यह सिर्फ एक आयोजन नहीं था, बल्कि राजनीतिक ताकत और जनाधार का प्रदर्शन था। राजस्थान भर से अलग-अलग समुदायों की मौजूदगी, नेताओं की भागीदारी और कार्यकर्ताओं की ऊर्जा—इस कार्यक्रम ने यह सवाल मजबूती से खड़ा कर दिया कि क्या कांग्रेस राजस्थान से राज्यसभा में किसी मुस्लिम चेहरे के जरिए बड़ा संदेश देना चाहती है? अगर राजनीतिक प्रभाव और जनसमर्थन की कसौटी पर देखें, तो पैगाम-ए-मोहब्बत का पलड़ा भारी दिखता है।
दिल्ली का गणित: नजदीकी, संतुलन और भविष्य
दिल्ली में निर्णय सिर्फ कार्यक्रमों से नहीं, समीकरणों से होता है। पवन खेड़ा को गांधी परिवार के करीब माना जाता है, जबकि अलका लांबा की नजदीकी केसी वेणुगोपाल से जोड़ी जाती है। लेकिन राज्यसभा का टिकट आज सिर्फ व्यक्तिगत नजदीकी का मामला नहीं रहा। सवाल हैं कि क्या यह चेहरा राजस्थान में संगठन को मजबूत करेगा? क्या यह 2028 की तैयारी का हिस्सा होगा? और क्या इससे कांग्रेस का सामाजिक-राजनीतिक संदेश साफ जाएगा?
मणि शंकर अय्यर का नाम क्यों तैर रहा है?
इसी बीच राजनीतिक गलियारों में मणि शंकर अय्यर का नाम भी चर्चा में है। अनुभव और वैचारिक पहचान उनकी ताकत है, लेकिन उम्र और भविष्य की राजनीति उनके रास्ते की सबसे बड़ी चुनौती।
पैगाम किसका?
अगर कांग्रेस राजस्थान में सामाजिक संतुलन और आने वाले वर्षों की राजनीति को प्राथमिकता देती है, तो पैगाम-ए-मोहब्बत का संदेश ज्यादा दूर तक जाता दिखता है। लेकिन राजनीति में आख़िरी फैसला हमेशा दिल्ली करती है। अब इंतज़ार सिर्फ एक बात का है, राजस्थान से राज्यसभा का पैगाम, आखिर किसके नाम आता है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)















