चाॅंद-तारे भी किसी और की झोली में गये। रह गया सिर्फ़ मेरे पास सियाह रात का ग़म।।

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फोटो साभार अखिलेश कुमार

ग़ज़ल

-शकूर अनवर

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शकूर अनवर

आप समझें तो समझते रहें जज़्बात* का ग़म।                                                                                मेरे अश्कों ने तो ज़ाहिर किया हालात का ग़म।।
*
नाज़ उठाते हैं तुम्हारा तो उठाने वाले।
फ़िक्र किस बात की तुमको तुम्हें किस बात का ग़म।।
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चाॅंद-तारे भी किसी और की झोली में गये।
रह गया सिर्फ़ मेरे पास सियाह रात का ग़म।।
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न इसे फ़िक्रे-ज़माना न इसे फ़िक्रे-मुआश*।
सिर्फ़ रहता है मुहब्बत में मुलाक़ात का गम।।
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चाहता हूंँ कि मुहब्बत का न दामन छूटे।
खाये जाता है मगर ज़ीस्त की हाजात* का ग़म।।
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घर के छप्पर की वो हालत कि बताये न बने।
इक नया और मिला है हमें बरसात का ग़म।।
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हमने देखा है यहाँ मुल्क भी तक़सीम* हुआ।
हमने झेला है यहाँ दिल पे फ़सादात* का ग़म।।
*
शेर में आये रवानी तो कहाँ से आये।
दिल में रहता हो जहाँ साकिनो-हरकात* का ग़म।।
*
जीने देगा न तेरा मिल के बिछड़ना “अनवर”।
“मार डाले न कहीं इश्क़ के सदमात* का ग़म”।।
*
शब्दार्थ:-
जज़्बात*दिल की भावनाएं
फ़िक्रे-मुआश*रोज़गार की फ़िक्र
ज़ीस्त की हाजात* जीवन की आवश्यकताएँ
तकसीम*बटवारा
फ़सादात*दंगे
सकिनो-हरकात*शब्दों में ठहरने और गति देने की क्रिया
सदमात*दुख पीड़ा
शकूर अनवर
9460851271

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