
-प्रो. गीताराम शर्मा

श्रीमद्भगवद्गीता सार्वभौम ग्रंथ है। यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय ,जाति लिंग विशेष के लिए नहीं अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए कल्याण का मार्ग दिखाती है। श्रीमद् भगवद्गीता की कथा और पात्र भले ही ऐतिहासिक है लेकिन इसकी प्रासंगिकता अतीत,वर्तमान और भविष्य में प्रत्येक, समाज और राष्ट्र के लिए रही है और रहेगी। दार्शनिक रुप में देखें तो दुविधाओं में घिरा हर मनुष्य अर्जुन है जिसे अपनी समस्याओं के द्वन्द्वों के अंधेरे को जीतने का समाधान रुपी प्रकाश चाहिए।समस्याएँ चाहे आधिभौतिक हो, या आधिदैविक अथवा आध्यात्मिक।श्रीमद्भगवद्गीता का अमर विचार सभी समस्याओं का एकमेव समाधान है।चेतना के उच्चतम शिखर पर आसीन होकर उद्भूत यह भागवत सन्देश सन्देश व्यष्टिगत और समष्टिगत शरीर,मन,बुद्धि,और प्राणों को चेतना की लय में मिलाकर आनन्दरस सिन्धु में निमंजित करने वाला जीवन संगीत है।श्रीमद्भगवद्गीता वैराग्य या मृत्यु के बाद संभावित मुक्तिभर के लिए काम्य शास्त्र नहीं अपितु इस संसार में सुख-दुख,लाभ-हानि, हार -जीत की परवाह किये बिना अनवरत नैतिक कर्तव्य करते हुए इसी जीवन में मुक्ति साधना का विधान करती है। इसके 18 अध्यायों में इतना सत्य, ज्ञान, विधि, विज्ञान, व्यवहार,योग, कला,कर्मकौशल, और जीवन के बाह्य और आन्तरिक प्रबन्धन के लिए ऐसी दिव्य तकनीक भी है और उस तकनीक को समझने की दिव्य दृष्टि भी है।श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों के समन्वित रुप से उपदेश सार में 4 विद्याएँ विशेष रुप से उभरी हैं। अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या। अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है।साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व भाव पैदा करती है। ईश्वर विद्या के प्रभाव से साधक अहंकार और गर्व के विकार से मुक्त होकर स्वयं के कर्तृत्व और भोक्तृत्व को ईश्वर को अर्पित कर देता है जो कि भक्ति योग की अपरिहार्य योग्यता है। ब्रह्म विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जगाता है जिससे स्वरुप बोध अथवा जीवनमुक्ति की अवस्था प्राप्त होती है। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता इसी जीवन में मुक्तिविधान करती है। श्रीमद्भगवद्गीता भारत के मूल स्वभाव को व्यक्त कर उस पर चलने के लिए प्रेरित करती है।इस गीता राष्ट्रीय ग्रन्थ है और उसका श्रवण, मनन, चिन्तन और निदिध्यासन श्रेष्ठ राष्ट्र भक्ति है। गीता उपदेश मनुष्य मात्र को निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देता है।अपने धर्म( कर्तव्य) का पालन करना ही निष्काम योग है। इसका सीधा सा अभिप्राय है कि हमें परिवार, समाज या देश के लिए जो भी कर्तव्य प्राप्त हुए हैं,उन्हें पूरी पूरी तन्मयता से करें और उसे ईश्वर का कार्य मानकर फल ईश्वर की इच्छा पर छोड़ दें। स्वयं, परिवार,समाज तथा राष्ट्र के लिए कर्तव्य करते हुए उन्हें ईश्वर को सोंप कर कर्तृत्व के अहंकार से मुक्त रहना ही निष्काम कर्मयोग और भक्ति है। श्रीमद्भगवद्गीता भय, सन्त्रास,उद्वेग, आशा- निराशा और अनियंत्रित आकांक्षाओं के मनोवैज्ञानिक बोझ में दबे मनुष्य को शुद्ध सकारात्मक और सात्विक जीवन दृष्टि देती है। विशेषकरआज भौतिकवादी जीवनशैली ने युवाओं के लिए अनेक समस्याएं उत्पन्न की हैं जिनमें बहुत कम ही वास्तविक हैं शेष आरोपित हैं।इसका दुष्परिणाम न केवल उनके निजी जीवन पर अपितु सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर गहराई से देखा जा रहा है। युवाओं के मन में अनेक चिन्ता, निराशा, भय, आशंका,और तनाव तथा तज्जन्य शारीरिक,मानसिक और बौद्धिक समस्याएं सुरसा का मुख बनकर उनके व्यक्तित्व को निगल लेना चाहती हैं। तब गीता का चिन्तन उनमें बल, बुद्धि और विवेक का आधान कर उन्हें स्वयं को पहचाने का आह्वान करता है।वह विवश और वेवश युवा अर्जुन ही तो जो श्रीकृष्ण से कह रहा है कि –
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: |
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||
श्रीमद्भगवद्गीता 2/7
अर्थात् मैं अपने कर्तव्य के बारे में उलझन में हूँ, और चिंता और बेहोशी से घिरा हुआ हूँ। मैं आपका शिष्य हूँ, और आपके सामने आत्मसमर्पण कर रहा हूँ। कृपया मुझे कुछ के लिए निर्देश दें कि मेरे लिए क्या उचित है। भगवान् कहते हैं मुझ पर भरोसा करोगे तो मैं तुम्हारी योगक्षेम में कोई कमी छोड़ूँगा नहीं लेकिन तुम्हें देह में रहते हुए देह की सत्ता से ऊपर उठना होगा-
“मास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु: खदा:। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।
श्रीमद्भगवद्गीता 2) 14
अर्थात् – सुख-दुख का आना और चले जाना सर्दी-गर्मी के आने-जाने के समान है। इनको सहन करना सीखें, सबसे पहले सुख – दुख द्वन्द्व से मुक्त होना सीखें।
उन्होंने कहा कि जीवन की कोई समस्या जीवन से बड़ी नहीं है लेकिन न समस्याओं में उलझना है और समाधान के अहंकार में ।समस्याओं के समाधान में अहंकार होना स्वाभाविक है लेकिन अहंकार बहुत बड़ा अवरोध है उसमें भी तामस अहंकार तो जीवन के लिए विष तुल्य है जिसका स्वरुप श्रीमद्भगवद्गीता में इस प्रकार है –
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता 15/13-15
आसुरी व्यक्ति सोचता है-“मैंने आज इतनी संपत्ति प्राप्त कर ली है और मैं इससे अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकूँगा। यह सब मेरी है और कल मेरे पास इससे भी अधिक धन होगा। मैंने अपने उस शत्रु का नाश कर दिया है और मैं अन्य शत्रुओं का भी विनाश करूंगा। मैं स्वयं भगवान के समान हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं शक्तिशाली हूँ, मैं सुखी हूँ। मैं धनाढ्य हूँ और मेरे सगे-संबंधी भी कुलीन वर्ग से हैं। मेरे बराबर कौन है? मैं देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करूँगा, दान दूंगा, मैं सुखों का भोग करूँगा।” इस प्रकार से वे अज्ञानता के कारण मोह ग्रस्त रहते हैं। कुल मिलाकर श्रीमद्भगवद्गीता जीवन विज्ञान है। जो मृत्यु के बाद सुनने सुनाने के लिए नहीं जीवन रहते हुए मुक्त रहकर जीवित रहने के लिए उपास्य है। सचमुच यह जीवन का संगीत है, उपनिषदों का नवनीत है।वे भाग्यशाली हैं जिन्हें गीता,पठन, श्रवण, चिन्तन और जीवन में आचरण रुप भगवद् कृपा प्राप्त हुई है। हरि ऊँ तत्सत्।।
(सहायक निदेशक कालेज शिक्षा कोटा परिक्षेत्र, राजस्थान)

















