बारां का हाड़ौती पैनोरमा: उदासीनता का जीवंत उदाहरण

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पूरा फर्श मिट्टी और कबूतरों की बीट से अटा पड़ा था। कालजयी ग्रंथ वंश भास्कर के रचयिता सूर्य मल्ल मिश्रण, 1857 की क्रांति के नायक-नायिकाएँ महारानी लक्ष्मीबाई, तात्यां टोपे हाड़ौती के चारों जिलों के निर्माण में योगदान देने वाले राजा-महाराजा, साधु-संत, सबकी प्रतिमाएँ धूल और उपेक्षा में डूबी हुई थीं। दीवारों पर लिखी ऐतिहासिक जानकारियाँ गंदी और पढ़ने लायक नहीं बची थीं। मकड़ियों के जाले इस बात के गवाह थे कि यहाँ वर्षों से किसी ने सुध नहीं ली।

-शैलेश पाण्डेय-

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किसी सरकारी योजना, वह भी जनहित की पर यदि सद्भावना से लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाएँ और फिर उसे यूँ ही मरने के लिए छोड़ दिया जाए, तो वह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सांस्कृतिक अपराध बन जाता है। बारां में बना हाड़ौती पैनोरमा ऐसी ही सरकारी उदासीनता का जीवंत उदाहरण है।
हाल ही में कोटा में आयोजित कोटा हाड़ौती ट्रेवल मार्ट के समापन समारोह में भाग लेने आए  राजस्थान विरासत संरक्षण एवं संवर्धन प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत ने प्रदेशभर में स्थापित पैनोरमा परियोजनाओं की जानकारी दी। उद्देश्य था] प्रदेश के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और महापुरुषों से आमजन को परिचित कराना। इसी क्रम में पता चला कि करोड़ों रुपये की इस योजना के तहत एक पैनोरमा बारां में भी बनाया गया है।

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यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जीवन के छह दशक बारां में बिताने के बावजूद हमें और शायद अधिकांश बारावासियों को वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्रित्व काल में वर्ष 2018 में बने इस पैनोरमा की कोई जानकारी तक नहीं थी।
ओंकार सिंह लखावत से मिले हम तीन पत्रकारों धीरेन्द्र राहुल, पुरुषोत्तम पंचोली और मैं ने निश्चय किया कि इस पैनोरमा को स्वयं जाकर देखा जाए। सोशल मीडिया पर चर्चा के दौरान बारां के वरिष्ठ पत्रकार दिलीप शाह की टिप्पणी ने चिंता और बढ़ा दी “ऐसे पैनोरमा को तो आप अपने यहाँ ले जाइए, यहाँ कबूतरों की बीट के सिवा कुछ नहीं है।”
रविवार, 11 जनवरी को हम कोटा से बारां पहुँचे। हमारे साथ वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम दाधीच और वरिष्ठ पत्रकार सुबोध जैन भी थे। राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित इस भव्य इमारत को बाहर से देखकर लगा कि वास्तु और परिकल्पना दोनों प्रभावशाली हैं। लेकिन जैसे ही केयरटेकर ने ताला खोला और हम भीतर दाख़िल हुए दिल धक से रह गया।
पूरा फर्श मिट्टी और कबूतरों की बीट से अटा पड़ा था। कालजयी ग्रंथ वंश भास्कर के रचयिता सूर्य मल्ल मिश्रण, 1857 की क्रांति के नायक-नायिकाएँ महारानी लक्ष्मीबाई, तात्यां टोपे हाड़ौती के चारों जिलों के निर्माण में योगदान देने वाले राजा-महाराजा, साधु-संत, सबकी प्रतिमाएँ धूल और उपेक्षा में डूबी हुई थीं। दीवारों पर लिखी ऐतिहासिक जानकारियाँ गंदी और पढ़ने लायक नहीं बची थीं। मकड़ियों के जाले इस बात के गवाह थे कि यहाँ वर्षों से किसी ने सुध नहीं ली।
केयरटेकर का जवाब और भी पीड़ादायक था “यहाँ कोई आता ही नहीं। कभी कोई भटका हुआ आ जाए तो टिकट काट देते हैं। बाकी समय सुनसान रहता है।”

विडंबना यह है कि बाहरी परिसर सुव्यवस्थित है। लगाए गए पेड़-पौधे अच्छे से फल-फूल रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होने के कारण यह इमारत दूर से ही ध्यान आकर्षित करती है। भीतर उपलब्ध सामग्री यदि ठीक से देखी-पढ़ी जाए, तो 1857 की क्रांति में झालावाड़ रियासत की भूमिका, तात्यां टोपे का यहाँ एक सप्ताह का शासन, भगवान मथुराधीश का हाड़ौती आगमन, केशोरायपाटन का इतिहास, कोटा में चार माह तक चला क्रांतिकारियों का शासन लाला जयदयाल और मेहराब खान का बलिदान, गागरोन, शाहबाद, सहरिया आदिवासी संस्कृति सब कुछ गागर में सागर की तरह समाहित है।
ओंकार सिंह लखावत ने बताया था कि मेड़ता में मीरा बाई के पैनोरमा को अब तक 32 लाख लोग देख चुके हैं। वहीं बारां का पैनोरमा न प्रचार, न प्रसार, न संरक्षण नए साल के दस दिनों में दस दर्शक भी नहीं जुटा सका।
यदि हम अपनी विरासत, इतिहास और महापुरुषों के साथ ऐसा ही व्यवहार करते रहे, तो स्मारक बनाना केवल धन की बर्बादी ही नहीं, बल्कि हमारे गौरव का अपमान भी है। शायद इतिहास का किताबों में सुरक्षित रहना ही बेहतर हो—कम से कम हमारे आदर्शों और महापुरुषों की गरिमा से इस तरह खिलवाड़ तो नहीं होगा।

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