
राजनीति में समय से पहले सक्रियता असामान्य नहीं है। संगठन को जीवंत बनाए रखना, कार्यकर्ताओं में उत्साह भरना और जनता के बीच निरंतर उपस्थिति बनाए रखना दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा होता है। लेकिन जब चुनाव दूर हों और गतिविधियां अचानक तेज हो जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
-देवेन्द्र यादव-

राजस्थान की राजनीति में चुनावी कैलेंडर भले ही 2028–29 की ओर इशारा करता हो, लेकिन राजनीतिक गतिविधियों की रफ्तार देखकर लगता है जैसे चुनावी बिगुल अभी से बज चुका हो। खासतौर पर हाड़ौती संभाग में पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे तथा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
राजस्थान में इस समय भाजपा की सरकार है और फिलहाल उसे कोई प्रत्यक्ष खतरा भी नहीं दिखता। विधानसभा चुनाव 2028 में प्रस्तावित हैं। यानी अभी लगभग तीन वर्ष का समय शेष है। इसके बावजूद जिस तरह से भाजपा के बड़े नेता अपने-अपने क्षेत्रों में लगातार जनसंपर्क, शिलान्यास और सामाजिक-धार्मिक आयोजनों में उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, उसने राजनीतिक गलियारों में चर्चा को जन्म दे दिया है।
राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति कुछ अलग है। केंद्र में भाजपा की सरकार सहयोगी दलों के समर्थन पर टिकी है। विशेष रूप से नीतीश कुमार और एन. चंद्रबाबू नायडू की पार्टियों का समर्थन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी बीच लोकसभा में विपक्ष द्वारा ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया जाना भी राजनीतिक तापमान बढ़ा रहा है। होली के बाद 9 मार्च से शुरू होने वाले बजट सत्र में इस प्रस्ताव पर बहस संभावित है। परिणाम जो भी हो, लेकिन उससे पहले बिरला की अपने संसदीय क्षेत्र कोटा में बढ़ी हुई सक्रियता राजनीतिक संकेतों के रूप में देखी जा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि विपक्ष के साथ संवाद बढ़ाने के बजाय बिरला अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता के बीच अधिक समय बिता रहे हैं। बजट सत्र के अवकाश के दौरान उन्होंने कोटा में कई विकास कार्यों का शिलान्यास किया, सामाजिक संगठनों और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लिया और लगातार जनसभाओं को संबोधित किया। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह सक्रियता केवल क्षेत्रीय जुड़ाव नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक चुनौतियों की पूर्व तैयारी भी हो सकती है।
उधर, वसुंधरा राजे की सक्रियता भी चर्चा में है। लंबे समय से यह कयास लगाए जाते रहे हैं कि पार्टी हाईकमान उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकता है। हालांकि ये चर्चाएं अक्सर उठती और शांत हो जाती हैं, लेकिन इस बार उनकी क्षेत्रीय और संगठनात्मक सक्रियता ने अटकलों को फिर हवा दे दी है। क्या वे पुनः राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका की तैयारी कर रही हैं? या यह भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन का संकेत है?
हाड़ौती, जहां से बिरला सांसद हैं और राजे विधायक, वहां दोनों नेताओं की समानांतर सक्रियता स्थानीय राजनीति को और रोचक बना रही है। यह भी संभव है कि पंचायत राज और निकाय चुनावों को देखते हुए जमीनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम हो रहा हो। स्थानीय चुनाव अक्सर बड़े चुनावों की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं।
राजनीति में समय से पहले सक्रियता असामान्य नहीं है। संगठन को जीवंत बनाए रखना, कार्यकर्ताओं में उत्साह भरना और जनता के बीच निरंतर उपस्थिति बनाए रखना दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा होता है। लेकिन जब चुनाव दूर हों और गतिविधियां अचानक तेज हो जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब निगाहें संसद के आगामी बजट सत्र और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थितियों पर टिकी हैं। क्या यह सक्रियता संभावित राजनीतिक उथल-पुथल की पूर्व तैयारी है, या केवल संगठनात्मक मजबूती का प्रयास? इसका स्पष्ट संकेत आने वाले महीनों में ही मिलेगा।
फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान की राजनीति में तापमान मौसम से पहले ही बढ़ने लगा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















