
-रामस्वरूप दीक्षित-

किसी कवि
या लेखक की
किताब का आना
आना है उसका खुद के पास
शब्दों की काया में
हमारे ही शब्द जब लौटकर आते हैं हमारे पास
तो लगता है जैसे हमारा वजूद
लौट आया हो हममें
किताब की शक्ल अख्तियार कर
हमारे शब्द फिर कहने भर को ही
रह जाते हैं हमारे
वास्तव में वे होने जा रहे होते हैं सबके
शब्द की सार्थकता
एक से होते हुए अनेक का हो जाने में ही तो है
खुशबू होने भर को ही होती है फूल की
होती वह हर पास से गुजरने वाले की है
किताब का आना
आना है ऐसे मेहमान का
जो बना रहता है
पूरे हक के साथ
हमारे घर में
हमारे न रहने के बाद भी
हमारे न रहने पर होती है
इसकी और भी पूंछ परख
हमारी याद आने पर
घर के लोग आते हैं इस मेहमान के पास
और बैठकर बतियाते हैं हमारे बारे में
घर के लोग ताज्जुब करते हैं
कि मेहमान हमें उनसे भी ज्यादा
उनसे भी गहरे से जानता है
हम किन परिस्थितियों में
कितने बचे कितने टूटे
कितने बहाये आँसू
कितनी ली कब हिचकियाँ
और कब हंस पड़े ठठाकर
हमने किन किन से किया प्रेम
और कितना
और बदले में मिला कितना
याकि सिफर ही आया हाथ
किनसे की किस तरह की घृणा
कब कब बोले कितना सच
कितना झूठ
वे सभी बातें
जो हमने कभी नहीं बताईं कभी
घरवालों को
वे बताता है ये मेहमान
किताब का आना
हमारे जाने के बाद भी
हमारे बने रहने की इत्तला है
रामस्वरूप दीक्षित














