
ग़ज़ल
-शकूर अनवर-

समझ सको तो समझ लो हमारा ग़म क्या है।
जो ऑंख ख़ुश्क थी पहले अब उसमे नम* क्या है।।
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तुम्हारे क़ुर्ब* की ख़्वाइश किसे नहीं होती।
ऐ मेरे दोस्त मेरी आरज़ू में दम क्या है।।
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ये क्या सितम किया तुमने कि तू को छोड़ दिया।
तुम्हारे तर्ज़े-तकल्लुम* में अब ये हम क्या है।।
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जहाँ पे चैन मिलेगा वहीं पे जायेंगे।
हमारे वास्ते क्या बुतकदा, हरम क्या है।।
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कहाँ गये वो सितारे जो साथ चलते थे।
ये तीरगी* का समन्दर क़दम-क़दम क्या है।।
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नज़र की हद* को समझता है आसमाॅं “अनवर”।
ये आसमाॅं है तो फिर ऑंख का भरम क्या है।।
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नम*गीलापन
क़ुर्ब*समीप होना पास होना
तर्ज़-तकल्लुम*बात करने का अंदाज़
बुतकदा*जहाॅं मूर्तियाँ रखी जाती हों मंदिर
हरम*काबा
तीरगी*अंधकार
नज़र की हद*दृष्टि की सीमा
शकूर अनवर
9460851271














