
-प्रतिभा नैथानी-

यह खेत कभी उसके नाम पर था। अब जमींदार ने हड़प लिया है। उसकी मिट्टी को माथे से लगाकर वापसी की राह लेता है कि वहां बन रही मिल का चौकीदार पूछता है – अबे ! क्या चुरा कर ले जा रहा है ?
‘कुछ नहीं’ के सबूत के तौर पर मुट्ठी भर मिट्टी को वापस ज़मीन पर गिराता हुआ शंभू महतो !
गरीब शंभू की बेबसी देख किसका कलेजा ना मुंह को आ जाए !
‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी अभिनीत यह दृश्य समझाता है कि कला को अभिव्यक्त करने के नज़रिए में विविधता और बारीकी हो तो सादगी के बावजूद कृति अपने क्षेत्र में मील का पत्थर हो जाती है।
‘हरियाला सावन ढोल बजाता आया’ गीत में सूखी ज़मीन पर बारिश की बूंदे पड़ने का हिलोरें मारता उल्लास । ‘आ जा री आ निंदिया तू आ’ जैसे कर्णप्रिय लोरी और अपना घर छोड़कर परदेस जाने को विवश हुए बिदेशिया के दर्द को बयान करता मन्ना डे की आवाज में “मौसम बीता जाए” गीत !
“दो बीघा जमीन” से जुड़ा सब कुछ याद रखने लायक है। हिंदी सिनेमा के महान फिल्मकार बिमल रॉय की अद्भुत निर्देशकीय समझ की मिसाल है “दो बीघा जमीन”। इसके अलावा बंदिनी, देवदास, परिणीता, मधुमति, परख, नर्तकी, सुजाता, अपराधी कौन, नौकरी, परिवार,मुक्ति भी उनकी वह फिल्में हैं जो सिने प्रेमियों के दिल में बिमल रॉय को अमर कर जाती हैं।
” दैया रे दैया रे चढ़ गयो पापी बिछुआ’ – फिल्म ‘मधुमति’ का यह गीत भी हम सबने कभी ना कभी सुना ही होगा। फिल्म भले ही आधी सदी से भी ज़्यादा पुरानी हो चली हो, मगर यह गीत आज़ भी उतना ही ताज़ा और नया लगता है। इस फिल्म की शूटिंग रानीखेत (उत्तराखंड) के मझखाली गांव में हुई थी। फिल्म के निर्देशक बिमल रॉय इस अनजान जगह शूटिंग कर रहे थे कि एक संगीत आयोजन के सिलसिले में लैंसडाउन जाते हुए मोहन उप्रेती की टीम से उनका सामना हो गया ।
मोहन उप्रेती और उनकी पत्नी नईमा ख़ान की आवाज़ में उन्होंने सुना ‘ओ दरी हिमाला दरी पा छुमा छूम दरी’, और यहीं से सृजन हो गया “दैया रे दैया चढ़ गयो पापी बिछुआ का”।
मोहन उप्रेती उन दिनों पहाड़ की लोककथाओं, गीतों और संगीत को सहेजने का काम कर रहे थे । क्योंकि सलिल चौधरी बिमल रॉय की फिल्मों के संगीत का पर्याय बन चुके थे अतः फिल्म में यह गीत उन्हीं के नाम पर संगीतबद्ध दिखाया जाता है।
इसी फिल्म का एक और गीत ‘आजा रे परदेसी’ गीत है जिसके आख़िर में एक दूसरे को चकित हो देखते दिलीप कुमार और वैजयंती माला के दिल खिल जाने के प्रतीक रूप में जो पीला फूल दिखाया गया है, वह फ्योंली है। फ्योंली हमारे उत्तराखंड का एक जंगली फूल है। इस पर कई कहानियां और लोकगीत प्रचलित हैं। फिल्म में किरदारों का पहनावा और बोली-भाषा का पुट भी पहाड़ी संस्कृति से बहुत मिलता-जुलता है। मधुमति के बहाने बिमल रॉय ने ख़ुद को पहाड़ों से भी जोड़ लिया। इस महान फिल्मकार की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

















