
अगर कांग्रेस को राज्यों में चुनाव जीतने हैं, तो राहुल गांधी और हाई कमान को स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पूरा भरोसा करना होगा। चुनावी राज्यों में दिल्ली से अनावश्यक नेताओं की आवाजाही कम करनी होगी।
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस लगातार राज्यों के विधानसभा चुनाव क्यों हार रही है, इसका एहसास अब शायद पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को भी हो गया है। तमाम मेहनत और यात्राओं के बावजूद कांग्रेस चुनाव नहीं जीत पा रही, इसकी जड़ में क्या है, इसका संकेत राहुल गांधी ने 19 जनवरी को केरल में दिया।
केरल में कांग्रेस के नवनिर्वाचित निकाय सदस्यों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने साफ कहा कि जीत का रास्ता जनता के निरंतर संपर्क से होकर जाता है। उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के बीच रहने, जनहित के काम करने और आम कार्यकर्ताओं से जुड़े रहने की सलाह दी। यह संदेश केवल केरल तक सीमित नहीं था, बल्कि उन तमाम कांग्रेस नेताओं के लिए था जो दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के आसपास रहकर टिकट तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं से दूरी के कारण चुनाव नहीं जीत पाते।
मैं अपने ब्लॉग और वीडियो में कई बार यह बात कह चुका हूं कि कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह यह है कि चुनाव की घोषणा से पहले ही दिल्ली से “हाई कमान के नुमाइंदे” राज्यों में उतर जाते हैं। ये नेता स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं पर रुतबा जमाते हैं, जिससे जमीनी कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करता है। नतीजा यह होता है कि या तो वह निष्क्रिय हो जाता है या प्रत्याशी के लिए काम ही नहीं करता, और कांग्रेस जीती हुई बाजी हार जाती है।
बिहार विधानसभा चुनाव इसका ताजा उदाहरण है। वहां स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की तुलना में दिल्ली से आए नेताओं की भरमार दिखी। कांग्रेस की हालत क्या हुई, यह किसी से छिपा नहीं है। बिहार से कांग्रेस को सबक लेना चाहिए।
अगर कांग्रेस को राज्यों में चुनाव जीतने हैं, तो राहुल गांधी और हाई कमान को स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पूरा भरोसा करना होगा। चुनावी राज्यों में दिल्ली से अनावश्यक नेताओं की आवाजाही कम करनी होगी।
सबसे बड़ा सुधार प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया में जरूरी है। वर्तमान में स्क्रीनिंग कमेटियां दिल्ली में बैठकर टिकट तय करती हैं। राज्यों से बुलाए गए नेता अक्सर अपने निजी और गुटीय हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे टिकटों की बंदरबांट होती है। मजबूत और निष्ठावान कार्यकर्ता टिकट से वंचित रह जाता है और कार्यकर्ता वर्ग में नाराजगी फैलती है। टिकटों की घोषणा के बाद ‘टिकट बिकने’ जैसे आरोप लगते हैं और इसका सीधा असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ता है।
कांग्रेस को अपनी पुरानी, आजमाई हुई प्रक्रिया की ओर लौटना चाहिए। स्क्रीनिंग कमेटी को समय लेकर ब्लॉक, जिला और प्रदेश स्तर पर जाकर कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करना चाहिए। ब्लॉक और जिलों से बने पैनल प्रदेश स्तर पर चर्चा के बाद अंतिम रूप लें। इससे हाई कमान को यह स्पष्ट जानकारी मिलेगी कि कौन प्रत्याशी मजबूत है, कौन कमजोर और कौन वास्तव में कांग्रेस की विचारधारा से जुड़ा हुआ है।
कभी यही प्रक्रिया कांग्रेस की ताकत हुआ करती थी और इसी वजह से पार्टी लगातार चुनाव जीतती थी। अगर राहुल गांधी आज के दौर में इस पुराने लेकिन कारगर मॉडल को अपनाते हैं, तो कांग्रेस की चुनावी किस्मत बदल सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं)

















