कांग्रेस में डैमेज कंट्रोल का संकट: 2014 के बाद क्यों कमजोर पड़ा हाईकमान का प्रभाव?

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कांग्रेस यदि राज्यों में जीत की राह तलाशना चाहती है, तो उसे “डैमेज कंट्रोल” की पुरानी शैली से आगे बढ़कर आधुनिक, पारदर्शी और जवाबदेह संगठनात्मक ढांचा विकसित करना होगा।

– देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

कांग्रेस के भीतर राज्यों में डैमेज कंट्रोल करने वाले नेता, जैसे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के युग में दिखाई देते थे, अब कहां हैं? 2014 में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई थी। उसके बाद से कांग्रेस लगातार तीन लोकसभा चुनाव हार चुकी है और देश के अनेक राज्यों में विधानसभा चुनावों में भी पराजित हो रही है।
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हार के बाद अक्सर एक ही बात सुनाई देती है कि राज्यों में नेता एकजुट नहीं हैं और नेताओं के बीच कुर्सी की लड़ाई के कारण कांग्रेस ने या तो अपनी सत्ता गंवा दी या फिर सत्ता में वापसी नहीं कर पाई।
सवाल यह है कि 2014 के बाद कांग्रेस में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के दौर जैसे डैमेज कंट्रोल करने वाले नेता क्यों नहीं दिखते? यदि ऐसे नेता मौजूद भी हैं, तो क्या उनकी बात कांग्रेस के कार्यकर्ता और स्थानीय नेता सुन नहीं रहे हैं, या फिर उनकी बात पार्टी हाईकमान तक पहुंच ही नहीं पा रही है?
2014 के बाद यह देखा जा रहा है कि जब भी किसी राज्य में नेताओं के बीच राजनीतिक तकरार होती है, तो उसे शांत करने के लिए निगाहें गांधी परिवार की ओर उठती हैं। गांधी परिवार के हस्तक्षेप के बाद तकरार आंशिक रूप से शांत तो हो जाती है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं होती। इसका प्रमाण यह है कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती।
इसके विपरीत, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के दौर में जब राज्यों में गुटबाजी या तकरार होती थी, तो हाईकमान की ओर से वरिष्ठ नेताओं की टीम भेजी जाती थी। वे वहीं पर विवाद सुलझाकर लौटते थे और कई बार कांग्रेस चुनावों में सफलता भी प्राप्त करती थी।
कांग्रेस ने राज्यों में गुटबाजी और कुर्सी की राजनीति को नियंत्रित करने तथा संगठन को मजबूत बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रभारी और सह-प्रभारी नियुक्त किए हैं। लेकिन यदि उनकी मौजूदगी में भी राज्यों में तकरार जारी रहती है, तो यह संकेत है कि या तो स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को उन पर भरोसा नहीं है, या फिर वे प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर, राजस्थान के प्रभारी रहे मुकुल वासनिक, जो महाराष्ट्र से लोकसभा चुनाव हारने के बाद राजस्थान से राज्यसभा सदस्य बने—ऐसी परिस्थितियां भी सवाल खड़े करती हैं कि क्या प्रभारियों की भूमिका पूरी तरह संगठनात्मक है या उसमें व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरण भी शामिल हो जाते हैं।
2014 से पहले और उसके बाद की स्थिति में बदलाव क्यों आया? कांग्रेस राज्यों के विधानसभा चुनाव लगातार क्यों हार रही है? राज्यों में हो रहे संगठनात्मक नुकसान को राष्ट्रीय प्रभारी और सह-प्रभारी नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रहे? और राज्यों के नेताओं की उम्मीद केवल राहुल गांधी से ही क्यों रहती है? दिल्ली से भेजे गए नेताओं से अपेक्षा क्यों नहीं बन पाती? क्या स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की शिकायतें राहुल गांधी और हाईकमान तक नहीं पहुंचतीं?
पूर्व में भी यह तर्क दिया गया है कि कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान उसके संगठनात्मक ढांचे से हो रहा है, विशेषकर संगठन महामंत्री के पद से। कुछ लोगों का मानना है कि इस पद की भूमिका और संरचना पर पुनर्विचार होना चाहिए।
इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री का पद अस्तित्व में आया। आलोचकों का कहना है कि इस पद की संरचना ने सूचना-प्रवाह को सीमित कर दिया है और राज्यों की वास्तविक स्थिति शीर्ष नेतृत्व तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती। यदि राज्य की रिपोर्ट संगठन महामंत्री तक सीमित रह जाए और शीर्ष नेतृत्व तक प्रत्यक्ष संवाद न हो, तो निर्णय अधूरी जानकारी पर आधारित हो सकते हैं। स्थानीय नेता भी इसे समझते हैं, इसलिए वे सीधे राहुल गांधी या हाईकमान की ओर देखते हैं।
राहुल गांधी को यह भी देखना होगा कि इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के दौर में राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सीमित संख्या में पदाधिकारी होते थे। पांच से सात महासचिव और लगभग इतने ही सचिव हुआ करते थे, जो राज्यों में संगठन को सशक्त बनाने में सक्रिय भूमिका निभाते थे।
आज राष्ट्रीय स्तर पर महासचिवों और सचिवों की संख्या अधिक है, लेकिन क्या उनकी भूमिका और जवाबदेही उतनी ही स्पष्ट है? यही स्थिति कई राज्यों में भी देखने को मिलती है, जहां पदाधिकारी अधिक हैं, पर प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।
संभवतः यही कारण है कि जब भी किसी राज्य में राजनीतिक संकट उत्पन्न होता है, तो स्थानीय नेता वहां मौजूद राष्ट्रीय प्रभारियों पर भरोसा करने के बजाय सीधे राहुल गांधी से हस्तक्षेप की अपेक्षा करते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि शीर्ष नेतृत्व ही अंतिम समाधान दे सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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