संगठनात्मक प्रशिक्षण बनाम राजनीतिक प्रबंधन: कांग्रेस के सामने असली चुनौती

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photo courtesy social media
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि उसे राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखने की है। जिला अध्यक्षों का प्रशिक्षण एक आवश्यक कदम है, परंतु पर्याप्त नहीं। जब तक राज्य स्तर पर नेतृत्व स्पष्ट, जवाबदेह और समन्वित नहीं होगा, तब तक जिला स्तर की ऊर्जा भी बिखर सकती है। राहुल गांधी के लिए यह समय संगठनात्मक प्रयोगों से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रबंधन की गहराई में जाने का है। यदि असम से सबक लेकर पंजाब और अन्य राज्यों में समय रहते संतुलन साधा गया, तो संगठन सृजन की यह प्रक्रिया वास्तविक परिणाम दे सकती है। अन्यथा प्रशिक्षण सत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।

-देवेन्द्र यादव-

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

देशभर में संगठन सृजन अभियान चला रही कांग्रेस अब जिला स्तर पर ढांचे को मजबूत करने की कवायद में जुटी है। हाल ही में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने राजस्थान सहित कई राज्यों के नव-नियुक्त जिला अध्यक्षों को दिल्ली बुलाकर प्रशिक्षण दिया। उन्हें बताया गया कि संगठन को बूथ स्तर तक कैसे सक्रिय किया जाए, सामाजिक समीकरण कैसे साधे जाएं और जनसंपर्क को कैसे विस्तार दिया जाए।
प्रश्न यह है कि क्या एक-दिवसीय प्रशिक्षण से जिला अध्यक्ष राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जाएंगे? क्या इससे चुनावी जीत सुनिश्चित हो जाएगी? संगठनात्मक दक्षता महत्वपूर्ण है, परंतु राजनीतिक वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल होती है।
प्रशिक्षण की सीमा और नेतृत्व का संकट
पिछले एक वर्ष से अधिक समय से कांग्रेस देशभर में संगठन सृजन की प्रक्रिया में है। नए जिला अध्यक्ष नियुक्त हो रहे हैं, संरचनात्मक बदलाव किए जा रहे हैं। किंतु दूसरी ओर कई राज्यों में आंतरिक खींचतान, गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष खुलकर सामने आ रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना संगठनात्मक कमजोरी की ओर संकेत करता है। उदाहरण के तौर पर असम में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा का पार्टी छोड़कर भाजपा में जाना गंभीर संकेत है। यह तब हुआ जब वहां पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी के रूप में लंबे समय से भंवर जितेंद्र सिंह तैनात हैं। उनके कार्यकाल में कांग्रेस 2021 का विधानसभा चुनाव हार चुकी है और 2026 के चुनाव से पहले ही संगठन में बड़ा झटका लग गया।nऐसे में मूल प्रश्न यह है कि जिला अध्यक्षों को प्रशिक्षण देना पर्याप्त है या राज्यों में भेजे गए राष्ट्रीय प्रभारियों की जवाबदेही तय करना अधिक आवश्यक है? यदि राज्य स्तर पर रणनीतिक समन्वय कमजोर रहेगा तो जिला स्तर की ऊर्जा भी निष्प्रभावी हो जाएगी।
ए और बी प्लान की रणनीति: भ्रम या विकल्प?
हाल के चुनावों में कांग्रेस की तथाकथित “ए और बी प्लान” रणनीति की चर्चा रही है। बिहार सहित कुछ राज्यों में यह रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। असम में भी विधानसभा चुनाव की घोषणा कभी भी हो सकती है, लेकिन वहां संगठनात्मक स्पष्टता से अधिक रणनीतिक असमंजस दिखाई देता है। यदि केंद्रीय नेतृत्व के आसपास बैठे रणनीतिकार जमीनी वास्तविकताओं को समझने में चूक करते हैं, तो उसका खामियाजा राज्य इकाइयों को भुगतना पड़ता है। प्रशिक्षण का फोकस केवल संरचना पर नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन और संकट-नियंत्रण पर भी होना चाहिए।
पंजाब: संभावित संघर्ष की पूर्व भूमिका
अब दृष्टि पंजाब की ओर जाती है, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। यहां कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी के रूप में भूपेश बघेल जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। लेकिन पंजाब कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर अनेक नेता सक्रिय हैं। यह प्रतिस्पर्धा यदि समय रहते संतुलित नहीं की गई तो असम जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से 8 सीटें जीतीं। इस सफलता में दलित मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की सामाजिक स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण कारक बनी। इससे पहले, जब कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया, तब आंतरिक असंतोष ने 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान पहुंचाया और आम आदमी पार्टी को सत्ता का अवसर मिला।
चर्चाएं यह भी हैं कि अमरिंदर सिंह की संभावित वापसी पर विचार हो रहा है। लेकिन यह भी तथ्य है कि लोकसभा 2024 में कांग्रेस की वापसी उनके बिना संभव हुई। अतः निर्णय केवल भावनात्मक या सामरिक समीकरणों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक आकलन के आधार पर होने चाहिए।
डैमेज कंट्रोल की परंपरा और वर्तमान आवश्यकता
कांग्रेस के इतिहास में संकट-प्रबंधन की सशक्त परंपरा रही है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के दौर में राज्यों में उभरते संकटों को समय रहते नियंत्रित किया जाता था। मजबूत राजनीतिक पर्यवेक्षक और संवाद तंत्र सक्रिय रहते थे। आज आवश्यकता इस बात की है कि जिला स्तर के प्रशिक्षण के साथ-साथ राज्य प्रभारियों और रणनीतिक नेतृत्व को भी राजनीतिक प्रबंधन का कठोर प्रशिक्षण दिया जाए। अनुभवी नेताओं—जैसे सचिन पायलट, बी.के. हरिप्रसाद, रंजीत रंजन, कुमारी शैलजा, मुकुल वासनिक और रणदीप सिंह सुरजेवाला—को संगठनात्मक डैमेज कंट्रोल की संरचना में सक्रिय भूमिका दी जा सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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