
ग़ज़ल
-शकूर अनवर-

न चारागर* से न मुझको दवा से मिलता है।
सुकून जो मुझे माॅं की दुआ से मिलता है।।
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चमन की सैर में अब एहतियात* बरतूॅंगा।
ये ज़ख्मे दिल मुझे ताज़ा हवा से मिलता है।।
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इसीलिये तो भटकते हैं दश्तो-सहरा* में।
हमारा सिलसिला ग़ारे-हिरा* से मिलता है।।
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हमारी दुखती हुई रग पे हाथ रखता है।
हमारा दुश्मने-जाॅं* किस अदा से मिलता है।।
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अगरचे रूह की परवाज़* आसमानी है।
मगर ये जिस्म तो तहतुस सरा* से मिलता है।
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हमारी राह में दैरो-हरम* नहीं आते।
हमारा रास्ता फिर भी ख़ुदा से मिलता है।।
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कहीं भी जाऊॅं वहीं लौटता हूॅं फिर “अनवर”।
सुकूने-दिल* तो उसी बेवफ़ा से मिलता है।।
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चारागर* चिकित्सक डॉक्टर
एहतियात* सावधानी
दश्तो-सहरा* जंगल और रेगिस्तान
ग़ारे-हिरा* हिरा पहाड़ की वो खोह जहाॅं मुहम्मद साहब पर कुरान की आयत अवतरित हुई
दुश्मने-जाॅं* जान का दुश्मन प्रेमिका
परवाज़* उड़ान
तहतुस सरा* पाताल लोक
दैरो-हरम*मंदिर मस्जिद काबा काशी
सुकुने-दिल* दिल का चैन
शकूर अनवर
9460851271


















बहुत खूब