क्या कांग्रेस बार-बार वही गलती दोहरा रही है?

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कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह राज्यों में नेतृत्व को सशक्त बनाकर सामूहिक रणनीति पर आगे बढ़ेगी या व्यक्तिनिष्ठ मॉडल पर निर्भर रहेगी। चुनाव जीतने के लिए सिर्फ चेहरे नहीं, बल्कि स्पष्ट दिशा, अनुशासित संगठन और समर्पित समन्वय की जरूरत होती है। यही वास्तविक राजनीतिक कसौटी है।

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

क्या कांग्रेस बिना ठोस राजनीतिक गणित के ही राज्यों में अपने राष्ट्रीय प्रभारी नियुक्त कर देती है? पिछले कुछ वर्षों के फैसलों को देखें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है। पार्टी ने समय-समय पर पूर्व मुख्यमंत्रियों को अलग-अलग राज्यों का प्रभारी बनाया, लेकिन जिन राज्यों में उन्हें जिम्मेदारी दी गई, वहां संगठन को अपेक्षित मजबूती मिलती नजर नहीं आई।
उदाहरण के तौर पर, हरीश रावत को 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब का प्रभारी बनाया गया। नतीजा यह हुआ कि पंजाब में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में सामाजिक समीकरण कांग्रेस के पक्ष में बन सकते थे, लेकिन आंतरिक कलह और रणनीतिक असमंजस भारी पड़ा। इसका असर उत्तराखंड पर भी पड़ा, जहां से हरीश रावत आते हैं। वहां भी कांग्रेस सत्ता में वापसी नहीं कर सकी।
अब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाया गया है। सवाल वही है। क्या यह निर्णय संगठनात्मक मजबूती के आधार पर है या परंपरागत ढर्रे का हिस्सा? पंजाब में गुटबाजी खुलकर सामने है। हाल ही में पंजाब के बरनाला में हुई सभा में राहुल गांधी को मंच से ही प्रदेश नेतृत्व को टीम भावना का पाठ पढ़ाना पड़ा। उन्होंने साफ कहा कि कप्तान बनने की नहीं, खिलाड़ी बनकर काम करने की जरूरत है।
लेकिन राजनीति सिर्फ खिलाड़ियों से नहीं चलती। टीम को दिशा देने वाला कोच भी चाहिए। और खेल की निष्पक्षता सुनिश्चित करने वाला रेफरी भी। कांग्रेस में अक्सर यह दोनों भूमिकाएं उन्हीं नेताओं को मिल जाती हैं, जिनकी अपनी राज्यीय महत्वाकांक्षाएं होती हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिनका ध्यान अपने गृह राज्य की राजनीति और भविष्य की संभावनाओं पर हो, वे दूसरे राज्य में पूरी निष्ठा से संगठन को कितना समय दे पाएंगे।
अशोक गहलोत और भूपेश बघेल जैसे वरिष्ठ नेता विभिन्न राज्यों में चुनावी जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। पर जिन राज्यों में वे प्रभारी या पर्यवेक्षक रहे, वहां परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे। ऐसे में रणनीतिकारों को आत्ममंथन करना होगा कि क्या पूर्व मुख्यमंत्रियों को ही हर बार प्रभारी बनाना सर्वोत्तम विकल्प है।
2027 में पंजाब और उसके तुरंत बाद 2028 में छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में भूपेश बघेल का फोकस किस राज्य पर अधिक रहेगा, यह स्वाभाविक प्रश्न है। यदि नेतृत्व दो मोर्चों पर बंटा रहेगा तो संगठनात्मक ऊर्जा भी बंटेगी।
राहुल गांधी ने टीम भावना की बात सही कही। पर टीम की एकजुटता के लिए स्पष्ट नेतृत्व संरचना, निष्पक्ष समन्वय और राज्य विशेष की समझ रखने वाला प्रभारी आवश्यक है। जब कोच स्वयं मैदान में उतरने की तैयारी में हो, तो खिलाड़ी असमंजस में पड़ जाते हैं। रणनीति और क्रियान्वयन के बीच दूरी बढ़ जाती है।
कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह अनुभव के नाम पर पूर्व मुख्यमंत्रियों को प्रभारी बनाती रहेगी या राज्यवार संगठनात्मक जरूरतों के आधार पर नए मॉडल पर काम करेगी। चुनाव सिर्फ चेहरे से नहीं जीते जाते। स्पष्ट रणनीति, स्थानीय नेतृत्व का सम्मान और आंतरिक अनुशासन भी उतना ही जरूरी है।
अब देखना यह है कि 2027 में पंजाब का परिणाम कांग्रेस की रणनीति पर मुहर लगाएगा या एक बार फिर उसे आत्मचिंतन के लिए मजबूर करेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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