केजरीवाल की बेगुनाही के बाद नई सियासी हलचल, कांग्रेस के सामने बढ़ी चुनौती

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-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

दिल्ली शराब घोटाले में बड़ा मोड़ आया है। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरोप साबित नहीं होते। फैसले के बाद केजरीवाल पत्रकारों के सामने आए। वे भावुक दिखे। उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा कि सच की जीत हुई है।
अब असली चर्चा राजनीति में शुरू हुई है। क्या अदालत से राहत मिलने के बाद केजरीवाल खुद को प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में पेश करेंगे। क्या वे खुलकर कहेंगे कि वे पीएम नरेन्द्र मोदी को चुनौती देंगे।
यह सवाल सिर्फ आम आदमी पार्टी का नहीं है। यह कांग्रेस के लिए भी बड़ा सवाल है।
2014 के बाद से कांग्रेस यह मानकर चलती रही कि भाजपा के खिलाफ पूरा विपक्ष उसके साथ है। पर जमीन की राजनीति कुछ और कहानी कहती है। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को सीधे मुकाबले में हराया।
अब अगर केजरीवाल बेदाग छवि के साथ जनता के बीच जाते हैं तो कांग्रेस की मुश्किल बढ़ सकती है।
राहुल गांधी इन दिनों कई मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं। बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक तनाव जैसे सवाल उठा रहे हैं। उनकी सक्रियता से भाजपा असहज दिखती है। राहुल गांधी की लोकप्रियता भी बढ़ी है।
लेकिन राजनीति में जगह सीमित होती है। विपक्ष का चेहरा एक ही बनता है। क्या केजरीवाल की वापसी राहुल की चमक को कम करेगी। यह चर्चा अब खुलकर होने लगी है।
एक और सवाल है। अगर भाजपा कमजोर पड़ती है तो एनडीए के कुछ दल किस ओर जाएंगे। क्या वे कांग्रेस के साथ आएंगे। या फिर केजरीवाल के नेतृत्व में कोई तीसरा मोर्चा बनेगा।
तीसरे मोर्चे की बात नई नहीं है। पर हर बार वह टिक नहीं पाया। फिर भी राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं।
कांग्रेस के कुछ नेता आम आदमी पार्टी को भाजपा की बी टीम कहते रहे हैं। लेकिन आरोप लगाना आसान है। रणनीति बनाना कठिन है। दिल्ली विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण है, जहां कांग्रेस साफ हो गई थी। अब समय है ठंडे दिमाग से सोचने का।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि उसकी असली चुनौती सिर्फ भाजपा नहीं है। कई राज्यों में आम आदमी पार्टी सीधी टक्कर दे रही है। केजरीवाल की बेगुनाही ने उन्हें नई ऊर्जा दी है। वे इसे बड़े राजनीतिक अभियान में बदल सकते हैं। आने वाले महीनों में तस्वीर साफ होगी।
फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली की अदालत का यह फैसला राष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ाने वाला है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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