
राजस्थान में 2028 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत और वसुंधरा राजे की बढ़ती सक्रियता ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या दोनों नेता अपनी-अपनी पार्टियों पर दबाव बनाने की रणनीति में जुटे हैं, और यदि हाईकमान ने उन्हें नजरअंदाज किया तो क्या राजस्थान में तीसरे मोर्चे की संभावनाएं मजबूत होंगी?
-देवेंद्र यादव-

राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने में अभी लगभग ढाई वर्ष का समय बाकी है। वर्ष 2028 में चुनाव होने हैं, लेकिन राज्य के दो प्रमुख राजनीतिक दलों, सत्ताधारी भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बड़े नेता अभी से सक्रिय नजर आने लगे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बढ़ती सक्रियता राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर रही है। क्या यह सक्रियता आने वाले चुनावों से पहले प्रेशर पॉलिटिक्स का संकेत है?
दरअसल, दोनों ही नेताओं को उनकी पार्टियों के केंद्रीय नेतृत्व से पहले जैसा राजनीतिक महत्व मिलता दिखाई नहीं दे रहा। अशोक गहलोत और उनके समर्थकों को उम्मीद है कि यदि 2028 में कांग्रेस सत्ता में आती है तो चौथी बार भी गहलोत मुख्यमंत्री बन सकते हैं। दूसरी ओर, वसुंधरा राजे और उनके समर्थक यह मानकर चल रहे हैं कि यदि भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटती है तो मुख्यमंत्री पद के लिए उनका नाम फिर से सामने आ सकता है।
हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनावों ने दोनों नेताओं की उम्मीदों को झटका दिया था। अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता गंवा बैठी, जबकि भाजपा ने सत्ता में वापसी तो की, लेकिन पार्टी हाईकमान ने वसुंधरा राजे को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने के बजाय Bhajan Lal Sharma को मुख्यमंत्री बना दिया।
क्या हाईकमान फिर भरोसा करेगा?
राजस्थान में चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन गहलोत और वसुंधरा की सक्रियता यह संकेत दे रही है कि दोनों नेता अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना चाहते हैं। गहलोत तीन बार और वसुंधरा दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। इसलिए उनका प्रभाव आज भी कायम है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व 2028 में फिर इन्हीं नेताओं पर दांव लगाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा भी है कि यदि दोनों दलों ने अपने इन वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज किया, तो क्या राजस्थान में एक मजबूत तीसरे मोर्चे की संभावना पैदा हो सकती है?
क्या राजस्थान में तीसरे मोर्चे की जमीन तैयार हो रही है?
राजस्थान में अब तक कोई प्रभावशाली तीसरा मोर्चा खड़ा नहीं हो पाया है, लेकिन क्षेत्रीय और जातिगत दल समय-समय पर कांग्रेस और भाजपा दोनों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं। हालांकि ये दल कभी खुद सरकार नहीं बना पाए, लेकिन उन्होंने दोनों राष्ट्रीय दलों को गठबंधन और राजनीतिक समझौतों के लिए मजबूर जरूर किया।
पूर्व मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत ने लंबे समय तक जोड़-तोड़ की राजनीति के सहारे सरकार चलाई। अशोक गहलोत ने भी राजनीतिक प्रबंधन के जरिए अपनी सरकार बचाई थी। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि राजस्थान में भविष्य में कोई मजबूत तीसरा विकल्प उभर ही नहीं सकता।
राजस्थान की राजनीति में निर्णायक हैं आरक्षित और पिछड़े वर्ग की सीटें
राजस्थान विधानसभा की कुल 200 सीटों में से 59 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इनमें 34 सीटें अनुसूचित जाति और 25 सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। यदि ओबीसी प्रभाव वाले क्षेत्रों को भी जोड़ लिया जाए तो लगभग 79 सीटें ऐसी बनती हैं, जो राज्य की सत्ता का फैसला करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
वर्तमान विधानसभा में भाजपा के पास 118 सीटें हैं, जिनमें से 34 सीटें एससी-एसटी वर्ग की हैं। वहीं कांग्रेस के पास 67 सीटें हैं, जिनमें 21 सीटें आरक्षित वर्ग से आती हैं। साफ है कि इन वर्गों के समर्थन के बिना कोई भी दल सत्ता तक नहीं पहुंच सकता।
यदि मुस्लिम मतदाताओं को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो राजस्थान में 100 से अधिक सीटें ऐसी बनती हैं, जहां एससी, एसटी, ओबीसी और मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणाम तय करने की क्षमता रखते हैं।
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती
दिलचस्प बात यह है कि एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग लंबे समय तक कांग्रेस के पारंपरिक मतदाता रहे हैं, लेकिन अब इन वर्गों का झुकाव भाजपा की ओर ज्यादा दिखाई देता है। जबकि कांग्रेस की ओर से अशोक गहलोत जैसे ओबीसी नेता लंबे समय तक सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं।
कांग्रेस ने गहलोत को तीन बार मुख्यमंत्री बनाया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी अधिकतर समय ओबीसी वर्ग के नेताओं को जिम्मेदारी दी गई। वर्तमान में भी कांग्रेस के प्रमुख नेता अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली ओबीसी और दलित वर्ग से आते हैं।
इसके बावजूद कांग्रेस भाजपा की तुलना में कमजोर क्यों दिखाई देती है? इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि कांग्रेस के पास राजस्थान में एससी और एसटी वर्ग का कोई ऐसा प्रभावशाली स्वतंत्र नेता नहीं है, जिसकी अपनी अलग जनस्वीकार्यता हो। दलित नेतृत्व अब भी बड़े नेताओं की छाया से बाहर नहीं निकल पाया है।
मुस्लिम वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर
राजस्थान में कांग्रेस के लिए 2028 एक बड़ा अवसर भी लेकर आ सकता है। राज्य का मुस्लिम मतदाता अब भी काफी हद तक कांग्रेस के साथ माना जाता है। कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के प्रदेश अध्यक्ष एमडी चौपदार मुस्लिम युवाओं के बीच लोकप्रिय चेहरा माने जाते हैं।
अब नजर इस बात पर है कि क्या कांग्रेस 2026 के राज्यसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय के किसी युवा चेहरे को मौका देकर अल्पसंख्यक वर्ग का विश्वास और मजबूत करने का प्रयास करेगी। क्योंकि वर्तमान समय में राजस्थान में कांग्रेस का सबसे ईमानदार और स्थिर वोट बैंक यदि किसी समुदाय को माना जाता है, तो वह मुस्लिम समुदाय ही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















