राहुल गांधी की राजस्थान यात्रा से तय होगी कांग्रेस की भावी राजनीति?

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photo courtesy social media

-सचिन पायलट को मिलेगी बड़ी जिम्मेदारी या बरकरार रहेगा मौजूदा नेतृत्व?

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

1 जून, सोमवार को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की राजस्थान यात्रा, राजस्थान के प्रमुख कांग्रेसी नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट की भविष्य की राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है। राजस्थान कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी, कर्नाटक और केरल की तरह कोई बड़ा निर्णय लेते हुए राजस्थान कांग्रेस में भी बड़ा बदलाव करेंगे? क्या सचिन पायलट को 2018 की तरह 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का दायित्व सौंपते हुए फिर से प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाएगा? और क्या सचिन पायलट 2018 की तरह कांग्रेस को दोबारा सत्ता तक पहुंचा पाएंगे?

2018 में सचिन पायलट के सामने कांग्रेस के भीतर अशोक गहलोत ही सबसे बड़ी चुनौती थे, लेकिन इस बार परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब उनके सामने अशोक गहलोत के अलावा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी मजबूत दावेदार के रूप में मौजूद हैं। यदि 2027 में कांग्रेस सत्ता में आती है तो ये तीनों नेता भी मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार होंगे।

मुख्यमंत्री पद की दौड़ और सड़क पर संघर्ष

यदि मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों की बात करें तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के खिलाफ सड़क पर संघर्ष करते हुए फिलहाल दो ही नेता लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं—गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली। दोनों नेता कई मुद्दों पर साथ मिलकर भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन करते नजर आते हैं। राजस्थान में एक कहावत है—“जगरा कोई लगाता है और बाटी निकालकर कोई दूसरा खा जाता है।” ऐसा ही दृश्य 2018 में देखने को मिला था। कांग्रेस ने सचिन पायलट के नेतृत्व में सत्ता में वापसी की, लेकिन मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी पार्टी हाईकमान ने अशोक गहलोत को सौंपी।

क्या 2027 में भी दोहराया जाएगा 2018 का इतिहास?

क्या 2027 में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिलेगा? इसकी सुगबुगाहट विधानसभा चुनाव की घोषणा से ढाई साल पहले ही सुनाई देने लगी है। चर्चा है कि प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की जगह पार्टी हाईकमान सचिन पायलट को फिर से प्रदेश अध्यक्ष बना सकता है। क्या “जगरा और बाटी” का खेल चुनाव की घोषणा से पहले ही शुरू होने वाला है? इसका जवाब तलाशने के लिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं की निगाहें राहुल गांधी की राजस्थान यात्रा पर टिकी हुई हैं। यात्रा के दौरान राहुल गांधी किन नेताओं को अधिक तवज्जो देते हैं, इस पर कार्यकर्ताओं की पैनी नजर रहेगी।

2013 से 2018 तक का राजनीतिक सफर

यदि 2018 से पहले की स्थिति पर नजर डालें तो 2013 में भाजपा ने अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को भारी बहुमत से पराजित कर सत्ता हासिल की थी। उस समय कांग्रेस के पास ऐसा कोई बड़ा और लोकप्रिय नेता नहीं था जो पार्टी को सत्ता में वापस ला सके। इसी कारण कांग्रेस हाईकमान ने सचिन पायलट को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाकर राज्य में संगठन को मजबूत करने और सत्ता में वापसी की जिम्मेदारी सौंपी थी।

तब राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट और अशोक गहलोत दो प्रमुख चेहरे थे, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब कांग्रेस के भीतर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के अलावा गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली भी ऐसे नेता हैं जो कांग्रेस की सत्ता में वापसी का आधार बन सकते हैं, बशर्ते उन्हें वरिष्ठ नेताओं का सहयोग मिले।

कांग्रेस के सामने हरियाणा जैसी चुनौती

राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति काफी हद तक हरियाणा जैसी दिखाई देती है। यहां मुख्यमंत्री पद के दावेदार एक नहीं, बल्कि कई हैं। चुनाव से पहले ही अलग-अलग नेताओं के समर्थक अपने-अपने नेतृत्व को आगे बढ़ाने में जुटे दिखाई देते हैं। चारों बड़े नेता न तो संयुक्त रूप से व्यापक आंदोलन करते दिखाई देते हैं और न ही राज्यव्यापी दौरों में एक साथ नजर आते हैं। राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे राजस्थान कांग्रेस के इन चारों प्रमुख नेताओं को एकजुट करें, क्योंकि फिलहाल संगठन के भीतर वह एकता स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती।

चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में अशोक गहलोत

अशोक गहलोत चौथी बार राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में जुटे हुए नजर आते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। राजस्थान कांग्रेस में ब्लॉक, जिला और प्रदेश स्तर पर बड़ी संख्या में ऐसे नेता हैं जिन्हें अशोक गहलोत का समर्थक माना जाता है। इनमें से अनेक नेताओं को राजनीतिक पहचान और अवसर गहलोत के नेतृत्व में मिले हैं। दूसरी ओर, सचिन पायलट को जब अवसर मिला, तब वे अपने समर्थकों को उसी स्तर पर राजनीतिक लाभ नहीं दिला सके। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी मानी जाती है।

सचिन पायलट के लिए अग्निपरीक्षा होगा 2027

2027 का विधानसभा चुनाव सचिन पायलट के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। अब तक उन्हें जो राजनीतिक महत्व और पहचान मिली, उसमें उनके पिता राजेश पायलट की राजनीतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आने वाले समय में सचिन पायलट को जो भी राजनीतिक उपलब्धियां हासिल होंगी, वे मुख्य रूप से उनकी अपनी राजनीतिक मेहनत, संगठन क्षमता और नेतृत्व कौशल के आधार पर तय होंगी। इसलिए 2027 का चुनाव केवल कांग्रेस के लिए ही नहीं, बल्कि सचिन पायलट के व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण परीक्षा माना जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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