
जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन, सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और राहुल गांधी की भूमिका पर उठते सवाल
-देवेंद्र यादव-

विपक्षी दलों और उनके नेताओं को बड़े आंदोलनों से दूर रखने की रणनीति कितनी कारगर है? किसान आंदोलन के बाद जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन ने इस सवाल को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन का चेहरा बने सोनम वांगचुक लगभग 20 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही है, लेकिन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की ओर से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनकी सेहत को लेकर देशभर में चिंता जताई जा रही है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्षी दलों और उनके नेताओं के बिना सरकार की नीतियों के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन सफल हो सकता है? किसान आंदोलन का उदाहरण अक्सर इस संदर्भ में दिया जाता है। आंदोलन के शुरुआती दौर में जब किसान संगठनों ने विपक्षी दलों से दूरी बनाए रखी, तब सरकार पर अपेक्षित दबाव नहीं बन पाया। बाद में विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी के समर्थन के बाद आंदोलन को व्यापक राजनीतिक और जनसमर्थन मिला। अंततः केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने का फैसला किया।
इसी संदर्भ में अब जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन को भी देखा जा रहा है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ती जा रही है और राजनीतिक हलकों की नजर कांग्रेस तथा राहुल गांधी की भूमिका पर टिक गई है। राहुल गांधी अब तक आंदोलन स्थल पर नहीं पहुंचे हैं, लेकिन 17 जुलाई को वे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के तहत छात्रों से संवाद करेंगे।
क्या देहरादून से मिलेगा आंदोलन को समर्थन?
अब सबकी नजर 17 जुलाई के इस कार्यक्रम पर है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या राहुल गांधी देहरादून से जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन का खुलकर समर्थन करेंगे? क्या वे सोनम वांगचुक से भूख हड़ताल समाप्त करने की अपील करेंगे? इन सवालों के जवाब का इंतजार बना हुआ है।
छात्र आंदोलन और समानांतर राजनीतिक गतिविधियां
कांग्रेस और राहुल गांधी लंबे समय से छात्रों की समस्याओं को संसद से लेकर सड़क तक उठाते रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भी पार्टी ने पेपर लीक जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था।
इसी बीच, देश में एक नए राजनीतिक समूह ‘कॉकरोच पार्टी’ के उभरने की चर्चा शुरू हुई। इस संगठन ने पेपर लीक के मुद्दे को आंदोलन का रूप दिया और घोषणा की कि छात्रों के इस आंदोलन को राजनीतिक दलों से दूर रखा जाएगा।
इसके समानांतर कांग्रेस ने भी अपना अभियान जारी रखा। राहुल गांधी ने 7 जून को राजस्थान के कोटा से ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की शुरुआत की थी। यह अभियान अभी भी जारी है और इसका अगला कार्यक्रम 17 जुलाई को देहरादून में प्रस्तावित है।
राहुल गांधी के अगले कदम पर टिकी निगाहें
अब सबसे बड़ा सवाल जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन और अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के कई नेता उनसे मिलने पहुंच चुके हैं, लेकिन राहुल गांधी के आंदोलन स्थल पर जाने या न जाने को लेकर अभी भी अटकलें बनी हुई हैं।
यह भी देखा जाएगा कि राहुल गांधी पहले देहरादून के कार्यक्रम के माध्यम से छात्रों को कोई बड़ा राजनीतिक संदेश देते हैं या बाद में सीधे आंदोलन स्थल पर पहुंचते हैं।
लेखक एक और सवाल उठाते हैं कि क्या सोनम वांगचुक अनजाने में सत्तारूढ़ भाजपा की राजनीतिक रणनीति में उलझ गए हैं? और यदि ऐसा है, तो क्या उन्हें इस स्थिति से बाहर निकालने में कांग्रेस और राहुल गांधी कोई निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

















