
भारत जोड़ो यात्रा से लेकर पेपर लीक आंदोलन तक, बदली राजनीतिक तस्वीर पर एक नजर
-देवेंद्र यादव-

राहुल गांधी सहित कांग्रेस के तमाम नेता अक्सर सत्तारूढ़ भाजपा पर आरोप लगाते हैं कि भाजपा ने राहुल गांधी और कांग्रेस की छवि खराब करने के लिए बड़े पैमाने पर संसाधनों का इस्तेमाल किया। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या भाजपा के कुछ कदम अनजाने में राहुल गांधी और कांग्रेस की छवि को मजबूत करने का काम कर रहे हैं? जिस तरह राहुल गांधी और कांग्रेस की लोकप्रियता देश की जनता के बीच बढ़ती दिखाई दे रही है, उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के कुछ राजनीतिक कदम कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने वाले साबित हो रहे हैं।
राहुल गांधी की छवि में बदलाव का महत्वपूर्ण दौर वर्ष 2022 रहा, जब उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा, भारत जोड़ो न्याय यात्रा और मणिपुर यात्रा निकाली। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस की छवि में बड़ा बदलाव देखने को मिला। कांग्रेस, जो 2014 में 44 और 2019 में 52 लोकसभा सीटें जीत सकी थी, उसने 2024 में 99 सीटें हासिल कीं। इसी सफलता ने राहुल गांधी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने का अवसर दिया।
भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बाद कांग्रेस ने देशभर में “संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ” का नारा बुलंद किया। इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला, जब लगातार दो चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई और अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी।
भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बावजूद यह सवाल उठता है कि क्या पार्टी ने इस परिणाम पर पर्याप्त आत्ममंथन किया। दूसरी ओर, कांग्रेस 99 सीटें जीतने के बाद भी संतुष्ट नहीं दिखी। राहुल गांधी लगातार 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराकर केंद्र की सत्ता तक पहुंचने की रणनीति पर काम करते नजर आए। भले ही 2024 के बाद कांग्रेस कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हारती रही, लेकिन राहुल गांधी और पार्टी का मनोबल कमजोर नहीं पड़ा। वे लगातार 2029 की तैयारी में जुटे दिखाई दे रहे हैं।
2024 के चुनाव में कांग्रेस को “संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ” अभियान से राजनीतिक लाभ मिला। अब सवाल यह है कि क्या 2029 के चुनाव में छात्रों और युवाओं के मुद्दे कांग्रेस के लिए नई राजनीतिक ताकत बनेंगे? राहुल गांधी लंबे समय से पेपर लीक, बेरोजगारी और युवाओं की समस्याओं को संसद से लेकर सड़क तक उठाते रहे हैं। इससे छात्रों और युवाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ती हुई दिखाई देती है।
पेपर लीक के मुद्दे पर जब छात्रों ने जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू किया, तब राहुल गांधी उनके समर्थन में नजर आए। 20 जुलाई को आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के बाद भी उन्होंने संसद और सड़क, दोनों जगह छात्रों के पक्ष में आवाज उठाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून लाने की घोषणा की और 29 जुलाई को संसद में एंटी पेपर लीक कानून पारित किया गया।
28 और 29 जुलाई को संसद में एंटी पेपर लीक कानून पर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की सदन में महत्वपूर्ण बहस के दौरान अनुपस्थिति भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी।
राहुल गांधी लगातार यह कहते रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में विपक्ष के सवालों का सामना करने से बचते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा के नेता राहुल गांधी के इस राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने का अवसर दे रहे हैं? क्या “डर” वाला राहुल गांधी का राजनीतिक संदेश प्रधानमंत्री मोदी की छवि को प्रभावित कर रहा है, या फिर भाजपा अनजाने में राहुल गांधी के आरोपों को बल दे रही है?
यदि राहुल गांधी की वर्तमान राजनीतिक स्थिति की बात करें तो वे देश के युवाओं और छात्रों के बीच पहले की तुलना में अधिक लोकप्रिय दिखाई देते हैं। इसका उदाहरण 20 जुलाई को देखने को मिला, जब राहुल गांधी आंदोलनकारी छात्रों के समर्थन में संसद से निकलकर कांग्रेस सांसदों और नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल्ली स्थित आवास की ओर विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंचे। वहां से उन्होंने छात्रों और युवाओं के समर्थन में देशवासियों से जंतर-मंतर पहुंचने की अपील की, जिसके बाद बड़ी संख्या में लोग अपने परिवारों के साथ धरना स्थल पर पहुंचने लगे।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के कुछ राजनीतिक कदम स्वयं राहुल गांधी और कांग्रेस की छवि को मजबूत करने का कारण बन रहे हैं? संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी अक्सर आरोप लगाते हैं कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जाता। 29 जुलाई को भी, एंटी पेपर लीक विधेयक पर बोलते समय सत्ता पक्ष की ओर से लगातार व्यवधान हुआ, जिसके बाद राहुल गांधी अपना वक्तव्य पूरा किए बिना बैठ गए। बाद में उन्होंने संसद परिसर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के सांसदों ने उन्हें अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

















