राहुल गांधी के संघर्ष के बीच क्या अशोक गहलोत साध रहे हैं अलग राजनीतिक समीकरण!

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photo courtesy social media

राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर उठते सवाल

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

एक तरफ कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी केंद्र की सत्ता से भारतीय जनता पार्टी को बाहर करने की रणनीति बनाने में जुटे हैं। वे संसद से लेकर सड़क तक छात्र, युवा और जनसरोकारों के मुद्दों पर संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत मानो राजस्थान में चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को मजबूत करने की राजनीतिक रणनीति पर काम करते दिखाई दे रहे हैं।

मौजूदा दौर में, जब राहुल गांधी छात्र-युवाओं के मुद्दों को लेकर लगातार सक्रिय हैं, तब अशोक गहलोत जैसे अनुभवी राजनीतिक रणनीतिकार से अपेक्षा की जा सकती थी कि वे इस अभियान में उनके साथ मजबूती से खड़े दिखाई दें। लेकिन इसके बजाय वे राजस्थान में अपनी राजनीतिक पकड़ और प्रभाव का प्रदर्शन करते नजर आ रहे हैं।

30 जुलाई को जयपुर के सिविल लाइंस स्थित अशोक गहलोत के आवास पर ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला। वहां “चौथी बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत” के नारे लगे। यह नारे उस समय लगे, जब राजस्थान के पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय के नेतृत्व में भारत आदिवासी पार्टी के कई कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा की।

इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या राजस्थान में अशोक गहलोत समानांतर राजनीतिक संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं। बांसवाड़ा से आए भारत आदिवासी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पहले अशोक गहलोत के आवास पर कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा की और बाद में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पहुंचकर औपचारिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।

दिलचस्प बात यह है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के सरकारी आवास भी सिविल लाइंस क्षेत्र में ही हैं और गहलोत के आवास से अधिक दूर नहीं हैं। यदि अशोक गहलोत चाहते, तो दोनों नेताओं को अपने आवास पर बुलाकर उनके समक्ष ही यह कार्यक्रम आयोजित कराया जा सकता था। लेकिन घटनाक्रम ने यह संदेश भी दिया कि गहलोत अपनी राजनीतिक ताकत का अलग प्रदर्शन करना चाहते थे।

अशोक गहलोत ने इस दौरान भारत आदिवासी पार्टी का कांग्रेस में विलय करने की भी अपील की। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या राजस्थान कांग्रेस में सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है।

एक और सवाल यह भी उठता है कि क्या राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट के मुकाबले नया राजनीतिक ध्रुवीकरण शुरू हो रहा है। महेंद्रजीत सिंह मालवीय लंबे समय तक अशोक गहलोत के करीबी माने जाते थे। लेकिन 2017 में जब सचिन पायलट राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने, तब मालवीय पायलट खेमे के साथ नजर आए और विधायक भी बने।

बाद के वर्षों में मालवीय और अशोक गहलोत के बीच राजनीतिक मतभेद रहे। इसके बाद मालवीय कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांसवाड़ा की सभा में कांग्रेस पर “मंगलसूत्र” संबंधी टिप्पणी की थी। उस समय महेंद्रजीत सिंह मालवीय भी भाजपा में मौजूद थे।

अब मालवीय की कांग्रेस में वापसी हुई है, लेकिन इस बार वे सचिन पायलट के बजाय अशोक गहलोत के साथ दिखाई दिए। इससे यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट के राजनीतिक प्रभाव को संतुलित करने की कोशिशें शुरू हो सकती हैं।

ऐसी भी राजनीतिक चर्चाएं हैं कि राहुल गांधी भविष्य में राजस्थान कांग्रेस के संगठन में बदलाव कर सकते हैं। यदि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस की कमान फिर से सचिन पायलट को मिलती है और कांग्रेस सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री पद को लेकर भी नई परिस्थितियां बन सकती हैं। हालांकि, यह पूरी तरह राजनीतिक अटकलों का विषय है।

संभवतः इन्हीं संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अशोक गहलोत ने आदिवासी बहुल बांगड़ क्षेत्र को राजनीतिक संदेश देने के लिए चुना। इसके जरिए उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि राजस्थान की राजनीति में उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है और उन्हें कमजोर नहीं आंका जाना चाहिए।

हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि राजस्थान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं को लेकर शक्ति प्रदर्शन में ही उलझे रहे, तो क्या पार्टी 2028 में सत्ता में वापसी कर पाएगी? यह सवाल केवल कांग्रेस की चुनावी रणनीति का नहीं, बल्कि अशोक गहलोत की राजनीतिक चालों और उनके दूरगामी प्रभाव का भी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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