आकाश की गहराई, क्षितिज की दूरी नाप सकते हैं लेकिन काशी के बारे जान पाना बहुत मुश्किल

कहते हैं बनारस का खाना यहां मरने से पहले ही मोक्ष दिला देता है, बहुत कुछ है यहां के खाने में, पर मुख्यतः शाकाहारी ही हैं। यहां गंगा स्नान और बाद में क्या मजदूर, रिक्शा वाला और क्या सेठ साहूकार सब ही का जलेबी, कचौरियां, लस्सी का नाश्ता डटकर, छककर ही घर जाना, ताकि घर पहुंच कर खाना खाने की चिंता ही नहीं रहे।

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-मनु वाशिष्ठ-

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मनु वशिष्ठ

आप, आकाश की गहराई नाप सकते हैं, क्षितिज की दूरी नाप सकते हैं लेकिन काशी बनारस के बारे जान पाना बहुत मुश्किल। शिव की नगरी, मंदिरो की नगरी, ज्ञान नगरी, दीपों का शहर, और भी कई नामों से अलंकृत किया गया है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक, अविनाशी शंकर की मोक्ष दायिनी नगरी, जिसे स्वयं शिव जी ने ही बनाया हो, भला आम मनुष्य की क्या बिसात, उसके लिए कहां संभव है, यह सब जान पाना। काशी को अगर जानना हो तो भरपूर समय, किसी भीड़ के साथ नहीं, अकेले या मात्र एक दो जन, जो आपकी ही वैचारिक स्तर से जुड़ा हुआ हो, और एक ऑटो या रिक्शे की सवारी, बस! कार वार के झंझट में नहीं पड़िएगा (नहीं तो दिनभर बस कार के ए सी की हवा ही खाते रहिएगा)। उम्र के इस पड़ाव पर पति पत्नी से बेहतर, कोई मित्र/ सहायक/ केयर टेकर नहीं हो सकता, यानि एक और एक ग्यारह। जैसा कि मैंने पढ़ा था यहां (काशी) के लोग गालियों के बिना बात ही नहीं करते, लेकिन मुझे ऐसा नहीं दिखा। यहां सड़कों पर चलते हुए किसी को भी गाली गलौज करते नहीं देखा, बाद में समझ आया यह सब बनारसी पान का कमाल है, जिसे ये मुंह में दबाए रहते हैं … क्या क्या लिखूं, समझ से परे है फिर भी कोशिश तो की ही जा सकती है।

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सारंगनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ

अभी कुछ समय, लगभग दो तीन महीने पहले ही बनारस जाना हुआ, वहां किसी को जानती नहीं थी, तो पता कर वहां मेरे गुरु भाई विनय जी से मिलना हुआ। उन्होंने जिस अपनेपन के भाव से हमें काशी (बनारस) का भ्रमण कराया, कई रोचक तथ्यों के बारे बताया, उससे लगा ही नहीं कि हम पहली बार काशी आए हैं, या पहली बार ही विनय जी से मिल रहे हैं। विनय जी से हमारा प्रोग्राम एक दिन पहले ही तय हो चुका था। मन में जो संकोच था वह सब समाप्त हो चुका था। सारनाथ जाते हुए, रास्ते में वरुणा नदी को पार करते समय विनय जी ने बताया, बनारस (काशी, वाराणसी, कहते हैं कि वरुणा नदी जो कि यहां बहती है और असी घाट, शायद इनको मिलाकर ही अपभ्रंश होकर वाराणसी नाम पड़ा हो ) एक और रोचक जानकारी विनय जी ने सारनाथ जाते हुए शेयर की। कहते हैं कि, एक बार गणेश जी गुस्सा होकर अपने मामा #सारंग के यहां चले गए थे, फिर शिवजी (नाथों के नाथ) उनको लिवाने यहां आए, तो यह #सारंगनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो आगे चलकर सारनाथ हो गया। एक और बात यूपी में साले को (सारा,सारे) कहते हैं, शायद इसी का अपभ्रंश #सारनाथ हुआ होगा। मजेदार!

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बुद्ध ने प्रथम उपदेश सारनाथ में ही दिया था

पहले दिन बाबा भोलेनाथ #ज्योतिर्लिंग के दर्शन बड़े ही आरामदायक स्थिति में किए, प्रशासन भी बेहद चाक चौबंद, कहीं कोई परेशानी नहीं, उसी दिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का रात्रि पूजा का आयोजन था, सरपट गाड़ियों का काफिला। दूसरे दिन जब हम सारनाथ के लिए निकले तो वहां भी यूपी की राज्यपाल के सम्मान में, #रेड कार्पेट बिछा हुआ था। हम भी खुश क्या पता हमारे लिए ही रेड कार्पेट बिछा हो हा हा हा… सारनाथ स्तूप, #बोधवृक्ष आदि देखने के बाद, #सारंगनाथ मंदिर दर्शन किए। वट वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान #बुद्ध ने प्रथम उपदेश सारनाथ में ही दिया था। कहते हैं, भोले की नगरी कभी सोती नहीं है, पूरी रात रौनक बनी रहती है। इस सब में विनय जी का आतिथ्य हमें बेहद अच्छा लग रहा था, जो अपनी आध्यात्मिक चर्चा के साथ बनारस की गलियों, तहजीब, संस्कृति से भी रूबरू करवा रहे थे। #बनारस #हिन्दू विश्वविद्यालय के बारे में तो सब जानते हैं, वहां भी जाना हुआ।

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प्रथम संस्कृत विश्वविद्यालय

विनय जी ने ही हमें यहां पर स्थित #विश्वप्रसिद्ध भारत की 168 (1791 स्थापना वर्ष) वर्ष पुरानी एकमात्र #प्रथम #संस्कृत #विश्वविद्यालय, जिसके जीर्णोद्धार का कार्य गुरुजी की कृपा से, एक और गुरुभाई संपन्न करवा रहे हैं, के बारे में बहुत विस्तृत, रोचक तथ्यों के साथ (मथुरा निवासी दीपक शर्मा) ने बताया। इसके जीर्णोद्धार का कार्य, जो कि अभी तक संभव नहीं हो पा रहा था, बड़ी ही रोचक लंबी कहानी है। कहते हैं, इस 168 साल पुरानी सम्पूर्णानंद #संस्कृत यूनिवर्सिटी का कीलन कर दिया गया था, और इसका जीर्णोद्धार संभव ही नहीं हो पा रहा था। रखरखाव के अभाव में जीर्णशीर्ण हो गया यह भवन, कई जगह से छत ढह गई थी, लगता था भूतों का बसेरा हो, कक्षाओं का संचालन भी बंद था। जो कोई भी इस कार्य को पूरा करने के उद्देश्य से अपने हाथ में लेता, कुछ न कुछ रुकावट आ ही जाती, और हार कर कार्य बीच ही में छोड़ भाग खड़ा होता। इस तरह दशकों से उपेक्षा की शिकार इस यूनिवर्सिटी के जीर्णद्धार का कार्य, लगभग तीन वर्ष पूर्व, *गुरुजी के शिष्य द्वारा शुरू हुआ। बीच बीच में परेशानियां आती रहीं, लेकिन वे गुरुजी का स्मरण कर कार्य करते रहे। इस कार्य में प्रगति हो रही है। मरम्मत कार्य के दौरान, एक बार एक जगह पर सैकड़ों की तादाद में चमगादड़ों ने डेरा डाला हुआ था, जोकि कार्य में रुकावट कर रही थी। हार कर गुरूभाई ने गुरुजी को स्मरण कर उन चमगादड़ों से स्थान खाली करने को कहा, और आप सबके लिए यह यकीन करना मुश्किल होगा कि सारी चमगादड़ एक साथ लाइन बना निकल गई। यह अविश्वसनीय दृश्य देखने लायक था, उसके बाद उन्होंने वहां पर गुरु जी का चित्र भी स्थापित कर दिया है। ऐसे ही और भी कई अनुभव, विनय जी ने सुनाए।

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कई संस्कृतियों की छाप

प्रोजेक्ट इंचार्ज प्रदीप भारद्वाज (अगर नाम में कहीं कोई गलती हुई हो तो क्षमा चाहूंगी,) का कहना है कि जीर्णोद्धार लगभग 3 साल पहले शुरू हुआ, संरक्षण का कार्य संभल संभल कर करना पड़ता है, जैसे-जैसे काम बढ़ता है नई समस्या आ जाती है, लेकिन गुरुकृपा से कार्य निर्बाध गति से चल रहा है। अभी कुछ समय पहले ही यहां आयोजित प्रोग्राम में यूपी की राज्यपाल आमंत्रित थीं। इसकी प्राचीनता बनाए रखने के लिए भवन निर्माण की सदियों पुरानी तकनीक का ही इस्तेमाल हुआ है। भवन मुख्यतः पत्थरों से बना है जिस पर विशेष तरीके से प्लास्टर किया गया था, कई जगह से उखड़ गया था दीवारें भी जीर्ण शीर्ण हो गई थी। जीर्णोद्धार में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि उसकी प्राचीन स्वरूप में कोई छेड़छाड़ ना हो। पनिंग के कार्य के लिए, विशेष प्रकार की मिट्टी को हजारों सेंटीग्रेड पर पकाकर फिर पहले जैसी कलाकृतियां बनाई गईं, इसके अलावा भी कई कार्य किए हैं, जिससे गिरने के कगार पर पहुंच चुके मुख्य भवन की आयु बढ़ गई है। मुख्य भवन की कलाकृतियों को देख एहसास होता है, कि इसके निर्माण में कई संस्कृतियों की छाप रही होगी। मुख्य द्वार पर प्रवेश करते दोनों तरफ चीनी #ड्रैगन स्वागत करते प्रतीत होते हैं, तो कई स्थानों पर सर्प, मछलियों के चित्र उकेरे गए हैं। बिल्डिंग पर बाहर चारों ओर हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी के साथ फारसी में लिखे नीतिवाक्य दिखाई देते हैं। कई ऐसे #प्रतीक हैं, जिसका अर्थ बताने वाला भी यहां कोई नहीं है। प्रकाश एवं वायु की अद्भुत व्यवस्था है, कई स्थानों से खुला हुआ है वहां से रोशनी अंदर आती है इस तकनीक को #स्काईलाइट कहते हैं। दिन में लाइट जलाने की जरूरत ही नहीं होती है। मलेशिया की लकड़ी का ट्रीटमेंट किया गया, ताकि दीमक, सीलन, धूप, पानी का असर ना हो। मरम्मत में कहीं भी सीमेंट और बालू का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। सुर्खी और चूने से जोड़ने का कार्य हो रहा है, विशेष कर के लखौरिया ईंटें बनवाई गई हैं। चूना, सुर्खी, गुड़, उड़द दाल और बताशे के पानी के मिश्रण से यह प्लास्टर तैयार किया गया है, यह काफी चिकना होता है, जैसा कि हमें भी छूने पर प्रतीत हुआ। यह प्लास्टर काफी मजबूत होता है, तथा तापमान को भी नियंत्रित करता है। मलेशिया की लकड़ी से बनाई गई छत सेंट्रल हॉल की छत को क्षतिग्रस्त होने के कारण विशेष किस्म की लकड़ी मंगाई गई, इसकी आयु लगभग 300 साल मानी जाती है। बेल्जियम के शीशे केरल, चेन्नई के कारीगरों ने फिट किए, भवन के चारों और रंगीन शीशे लगाए गए थे, कहते हैं शीशे राशि के रंग के अनुसार हैं, उस से छनकर सूर्य की रोशनी जमीन पर श्री यंत्र जैसी आकृति बनाती थी। टेराकोटा की कलाकृतियां क्षतिग्रस्त हो गई थी, इन को नया रूप देने के लिए, कोलकाता से विशेष प्रकार की मिट्टी (टेराकोटा) मंगाई गई।

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पञ्चांग यहीं की वेधशाला के अनुसार तैयार किया जाता है

अब आप इस यूनिवर्सिटी के बारे में और भी जानिए। #गोथिक शैली में निर्मित मुख्य भवन का शिलान्यास 2 नवंबर 1847 को #महाराजा बनारस व अंग्रेज वास्तुविद ब्रिटिश सेना के मेजर #मारखम किट्टो ने किया था। किट्टो की देखरेख में यह भवन 1852 में बनकर तैयार हुआ। वास्तुकार, इंजीनियर मेजर किट्टो ने इसे बनवाया, वो इसकी उत्कृष्टता को लेकर बहुत उत्साहित और कॉन्फिडेंट थे। उन्होंने विश्व के कई देशों के विद्वानों, वास्तुविदों को बुलाया और कहा कि मैंने इसे पूर्ण मनोयोग से बनाया है, अगर कोई इसमें कुछ भी कमी निकाल देगा तो मैं आत्मदाह कर लूंगा, स्वयं को नष्ट कर दूंगा।

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सब जन बारी बारी से उसको देखते रहे और उसमें कुछ भी कमी ना निकाल सके लेकिन जाते-जाते एक व्यक्ति ने कुछ ऐसा कह दिया कि इसका फर्श थोड़ा नीचा है, अगर कभी बाढ़ आती है तो यह डूब में हो जाएगा, इसमें पानी भर जाएगा, इतना सुनते ही वहीं पास में एक लोहे की सलाख, जो आग में गर्म हो रही थी उसको अपनी छाती पर दे मारा, और इस तरह स्वयं आत्मदाह कर लिया। मरने से पूर्व उन्होंने यह भी कहा, कि मेरी समाधि को इस यूनिवर्सिटी के मुख्य द्वार के सामने ही बनवाएं जहां से मैं, अपनी बनाई कलापूर्ण उत्कृष्टता का दर्शन करता रहूं। (#जनश्रुति के अनुसार)
यही वह संस्कृत यूनिवर्सिटी है, जहां उस समय रानी महारानियां पढ़ती थीं। आज भी #पञ्चांग यहीं की वेधशाला के अनुसार तैयार किया जाता है। स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना, कलाकारी के बेजोड़ नमूने, इस भवन को #विरासत सूची में डालने की तैयारी चल रही है।

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गुरु पूर्णिमा पर लंबी कतार

आगे चलकर गुरु हनुमान मंदिर के दर्शन किए, इसकी भी हमारे गुरुजी से संबन्धित एक रोचक कहानी है, मान्यता है ये #गुरू स्वरूप ही हैं। इसके बाद हम चल दिए एक और अनदेखी जगह (लाहिड़ी महाशय का पवित्र निवास स्थान) की तलाश में। एक सुखद अहसास हुआ, श्री #श्यामाचरणलाहिड़ी महाशय के पवित्र स्थान को देख कर। क्योंकि मैं उनके आध्यात्मिक परम्परा (क्रियायोग) से जुड़ी हुई हूं। एक योगी की आत्मकथा के रचियता श्री योगानंद जी व उनके गुरु युक्तेश्वरगिरी, मेरे परम आ. गुरूजी और भी कई ज्ञान पिपासु हस्तियों का विशेषकर योगियों का ही यहां के प्रति प्रेम लगाव रहा (क्योंकि ऐसे उच्च कोटि के महापुरुष केवल अपने अधूरे संकल्प, किसी विशेष कार्य पूरा करने के लिए ही जन्म लेते हैं) आम लोगों से तो उनका मिलना ना के बराबर ही होता था। (काशी के जिस घर में लाहिड़ी महाशय जी साधना करके स्वयं भगवान में परिणत हुए थे, जिस घर की माटी एवं एक एक ईंट पर्यन्त पवित्र हो चुकी हैं, जिस घर का आकाश पर्यन्त ब्रह्म में परिणत हो गया है, जहां बैठकर श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय जी सनातन धर्म की सारभूत एवं आध्योपंत बहुत सारी बातें बता गए हैं, जिस घर में प्रवेश करने से पहले ही मस्तक अपने आप ही नत हो उठता है, शरीर में सिहरन होने लगती है, वह घर लोगों के लिए कितना पवित्र है… किंतु दुख का विषय है कि देशवासियों का इस घर के प्रति वैसा कोई लगाव ही नहीं है ) यहीं यह छोटी सी जगह है, परन्तु गुरु पूर्णिमा पर लंबी कतार देखी जा सकती है, पैर रखने को भी जगह नहीं होती है। सामने ही एक बहुत छोटी सी दुकान पर बैठे एक व्यक्ति हमसे कुछ देर बातें करते रहे, और मैं उनके पुरखों के भाग्य को सराहती रही, उन्हें कभी बचपन, अज्ञानता में ही सही उनके दर्शन, सांनिध्य प्राप्त हुआ होगा। कुछ तो पुण्य कर्म होते हैं, जो जाने अनजाने, फल स्वरूप प्राप्त होते हैं।

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चमत्कारों से भरपूर

काशी तो है ही शिव भक्तों और शिव के चमत्कारों से भरपूर। काशी का वर्णन करने में भला कौन समर्थ है, मुझमें कहां इतनी बुद्धि सामर्थ्य जो भोले बाबा की महिमा का बखान कर सकूं। इतना कुछ है लिखने को शब्द कम पड़ जाएंगे। काशीनाथ बाबा के दर्शन, वहां की गलियां, सब अपनी अपनी खोज में निकले जिज्ञासु, कलकल बहती गंगा मैया, घाटों पर पुण्य की प्राप्ति की आकांक्षा लिए, डुबकी लगाते, हर हर महादेव, हर हर शंभो! का जयघोष, शाम को #गंगाआरती, यहां की संस्कृति, चाट, मिठाईयां, सिल्क और मिल्क (मलाईयौ, एक बहुत अच्छा पेय) ना जाने क्या क्या जिसे लिखने में मेरी बुद्धि कौशल समर्थ नहीं हो रहा है। चलते चलते एक और यादगार अनुभव, सिल्क की साड़ियां खरीदते वक्त कुछ पैसे कम पड़ गए, एटीएम भी पर्स में नहीं अन्य सूटकेस में था, दुकानदार महोदय ने (आर एस एस की खासियत है सहयोगी प्रवृति) ना केवल हम पर विश्वास किया कहा, आप आराम से अपनी यात्रा पूरी कीजिए, गंतव्य तक पहुंच कर खाते में पैसे डलवा दीजिएगा, बल्कि जलपान भी कराया। कचौरी एवं बनारस का प्रसिद्ध पेय मलाईयो (केसर के दूध को रात ओस में रख कर केवल झाग जैसा सा, ऊपर फेन जैसा कुछ) कुल्हड़ में पिलाया। कहते हैं बनारस का खाना यहां मरने से पहले ही मोक्ष दिला देता है, बहुत कुछ है यहां के खाने में, पर मुख्यतः शाकाहारी ही हैं। यहां गंगा स्नान और बाद में क्या मजदूर, रिक्शा वाला और क्या सेठ साहूकार सब ही का जलेबी, कचौरियां, लस्सी का नाश्ता डटकर, छककर ही घर जाना, ताकि घर पहुंच कर खाना खाने की चिंता ही नहीं रहे। हालांकि जंक फूड ने यहां भी घुसपैठ कर ली है, पर इतनी नहीं। बनारस की बात होने पर अधूरी रहेगी यदि घाट की चिताओं की, मोक्ष की, गंगा की, घाट पर आरती की, यहां के संगीत की, घरानों की बात ना की जाए। साधु-संतों के अनुसार काशी के राजा हैं शिव और काशी की जनता है शिव के गण। कुछ भी हो, यह मेरी #यादगार यात्रा रही।

__ मनु वाशिष्ठ, कोटा जंक्शन राजस्थान

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Sanjeev
Sanjeev
3 years ago

क्या बात है, ऐसा दर्शन तो हम खुद जाकर भी नहीं कर सकते जैसा आपने लेखनी से ही करा दिया । मां सरस्वती की कृपा ऐसे ही बनी रहे । बहुत बहुत बधाई

Manu Vashistha
Manu Vashistha
Reply to  Sanjeev
2 years ago

हार्दिक धन्यवाद ????