
-कांग्रेस में नेतृत्व चयन की राजनीति का पुराना चेहरा फिर सामने आया
केरल में कांग्रेस के मुख्यमंत्री चयन ने राजस्थान की 2018 की राजनीति की याद ताजा कर दी। तब सचिन पायलट की जगह अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने थे और के.सी. वेणुगोपाल की भूमिका चर्चा में रही थी। अब 2026 में परिस्थितियां बदलीं और केरल में वेणुगोपाल खुद मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर हो गए। यह घटनाक्रम कांग्रेस के भीतर बदलते शक्ति संतुलन और नेतृत्व की राजनीति को फिर उजागर करता है।
-देवेंद्र यादव-

15 मई को जैसे ही कांग्रेस के मीडिया विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयराम रमेश ने केरल में मुख्यमंत्री पद के लिए वी.डी. सतीशन के नाम की घोषणा की, वैसे ही राजस्थान की 2018 की राजनीतिक परिस्थितियां याद आ गईं। उस समय राजस्थान में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी और मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट माने जा रहे थे। राजस्थान में उस दौर में आम कार्यकर्ता, बड़ी संख्या में विधायक और युवा नेतृत्व सचिन पायलट के पक्ष में दिखाई दे रहा था। इसके बावजूद कांग्रेस हाईकमान ने एक बार फिर अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। राजनीतिक हलकों में तब यह चर्चा भी रही कि राहुल गांधी सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन अशोक गहलोत की राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक पकड़ भारी पड़ गई।
राजस्थान से केरल तक बदली राजनीतिक तस्वीर
2018 में कांग्रेस की जीत के बाद हाईकमान ने विधायकों की राय जानने के लिए के.सी. वेणुगोपाल को राजस्थान भेजा था। उस समय कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार अहमद पटेल माने जाते थे और माना गया कि वेणुगोपाल की रिपोर्ट के आधार पर ही सचिन पायलट की जगह अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया। राजनीति में समय किस तरह करवट लेता है, इसका उदाहरण केरल में देखने को मिला। 2026 के केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हाईकमान ने चुनाव पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी सचिन पायलट को दी। वहीं के.सी. वेणुगोपाल मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे। कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद राजनीतिक और मीडिया गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि केरल का अगला मुख्यमंत्री वेणुगोपाल हो सकते हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में विधायक उनके समर्थन में बताए जा रहे थे।
मुख्यमंत्री चयन में देरी ने बढ़ाई चर्चा
केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई को आए, लेकिन कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा 11 दिन बाद 15 मई को की। इसी दौरान अन्य राज्यों में सरकार बनाने वाली पार्टियां अपने मुख्यमंत्री घोषित कर चुकी थीं और शपथ ग्रहण भी हो चुके थे। केरल में फैसले में हुई इस देरी ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया। माना गया कि कांग्रेस नेतृत्व के भीतर मुख्यमंत्री चयन को लेकर लंबा मंथन चला।
राजनीति में समय स्थायी नहीं होता
जब केरल में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई और के.सी. वेणुगोपाल का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सामने आया, तब मैंने अपने ब्लॉग में लिखा था कि राजनीति में समय कभी किसी एक व्यक्ति का स्थायी नहीं रहता। परिस्थितियां बदलने में देर नहीं लगती। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि 2018 में राजस्थान में वेणुगोपाल प्रभावशाली भूमिका में थे और सचिन पायलट मुख्यमंत्री नहीं बन पाए थे। लेकिन 2026 में राजनीतिक परिस्थितियां बदली हुई दिखाई दीं। इस बार सचिन पायलट संगठनात्मक रूप से मजबूत स्थिति में नजर आए और अंततः के.सी. वेणुगोपाल मुख्यमंत्री नहीं बन सके। यह भी कहा जा सकता है कि राहुल गांधी को वेणुगोपाल की राजनीतिक कार्यशैली और संगठनात्मक प्रभाव को पूरी तरह समझने में लंबा समय लगा।
संगठनात्मक ताकत ने कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचाया
अशोक गहलोत और अहमद पटेल ने केरल से जिस नेतृत्व को राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ाया, उसने कई नेताओं को राजनीतिक संरक्षण जरूर दिया, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इससे कांग्रेस संगठन को अपेक्षित मजबूती नहीं मिल सकी। 2014 के बाद कांग्रेस कई राज्यों में मजबूत स्थिति के बावजूद सत्ता गंवाती रही। जिन राज्यों में पार्टी चुनाव हारती गई, वहां नेतृत्व और संगठन के बीच संतुलन की कमी साफ दिखाई दी। पार्टी के भीतर यह धारणा भी बनी कि कुछ प्रभावशाली नेता अपने अलावा किसी दूसरे नेता को उभरने नहीं देना चाहते थे। इसका असर कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति पर पड़ा और कई राज्यों में पार्टी कमजोर होती चली गई।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















