
केरल में वी.डी. एस. को मुख्यमंत्री चुनकर कांग्रेस नेतृत्व ने संगठन और सत्ता की राजनीति को लेकर बड़ा संकेत दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या राहुल गांधी अब गांधी परिवार के करीब रहने वाले नेताओं के बजाय जमीनी पकड़ वाले चेहरों को आगे बढ़ाएंगे और क्या राज्यों में लंबे समय से जमे वरिष्ठ नेताओं का दौर समाप्त होने जा रहा है।
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस ने केरल में मुख्यमंत्री पद के लिए वी.डी. एस. (वीडी सतीशन) का नाम घोषित कर उन नेताओं को एक तरह से चेतावनी दे दी है, जो राहुल गांधी से लगातार जुड़े रहकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं। 2014 में कांग्रेस की हार के बाद पार्टी लगातार तीन लोकसभा चुनाव हार चुकी है और कई राज्यों में सत्ता में वापसी नहीं कर पा रही है। कांग्रेस लगातार चुनाव क्यों हार रही है और जीत क्यों नहीं पा रही, इसकी समीक्षा में कई कारण सामने आते हैं। लेकिन एक कारण ऐसा भी है, जिसे ज्यादातर राजनीतिक समीक्षक और विश्लेषक नजरअंदाज कर देते हैं।
2014 की हार के बाद कांग्रेस के भीतर बैठे चतुर नेताओं ने अघोषित रूप से टीम सोनिया गांधी, टीम राहुल गांधी और टीम प्रियंका गांधी बना ली। इसके कारण कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अप्रत्यक्ष रूप से तीन गुटों में बंटी नजर आई। नेताओं द्वारा बनाई गई इन टीमों ने कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाया और पार्टी लगातार चुनाव हारती चली गई।
इन टीमों की कार्यशैली सबसे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में साफ नजर आई। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की कमान प्रियंका गांधी ने “लड़की हूं, लड़ सकती हूं” के नारे के साथ संभाली, लेकिन कांग्रेस केवल दो विधानसभा सीटें ही जीत सकी। कांग्रेस की इस बुरी हार का कारण उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने संदीप सिंह और धीरज गुर्जर को बताया। ये दोनों नेता टीम प्रियंका गांधी के हिस्से माने जाते थे। आरोप लगे कि 2022 के विधानसभा चुनाव में संदीप सिंह और धीरज गुर्जर ने अपने मन मुताबिक लोगों को टिकट दिलवाए।
यही नहीं, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हाईकमान द्वारा जिला अध्यक्षों की घोषणा में भी संदीप सिंह और धीरज गुर्जर का प्रभाव देखने को मिला। टीम प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में कितनी प्रभावशाली है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस हाईकमान अब तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन नहीं कर पाया है। जबकि प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और राष्ट्रीय प्रभारी अविनाश पांडे प्रदेश कार्यकारिणी बनाकर स्वीकृति के लिए हाईकमान को भेज चुके हैं, लेकिन अब तक अनुमति नहीं मिली है।
सवाल यह है कि क्या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केरल से गांधी परिवार के आसपास रहने वाले नेताओं को यह संदेश दिया है कि गांधी परिवार से नहीं, बल्कि स्थानीय जनता और कार्यकर्ताओं से जुड़कर कांग्रेस को मजबूत करो और चुनाव जिताओ?
यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि केरल में कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए तीन नामों की चर्चा थी। पहला नाम कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री के.सी. वेणुगोपाल का था, जिन्हें राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता है। दूसरा नाम रमेश चेन्निथला का था, जो राजीव गांधी के दौर से गांधी परिवार के करीबी और वरिष्ठ नेता रहे हैं। तीसरा नाम 61 वर्षीय वी.डी. एस. का था, जिनके नाम पर राहुल गांधी ने अंतिम मुहर लगाई और उन्हें केरल का मुख्यमंत्री घोषित किया।
क्या राहुल गांधी ने केरल के जरिए उन उम्रदराज नेताओं को भी संदेश दिया है, जो अब भी अपने-अपने राज्यों में मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद लगाए बैठे हैं? क्या अशोक गहलोत, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, भूपेश बघेल, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं का मुख्यमंत्री के रूप में समय समाप्त हो चुका है? और क्या राहुल गांधी केरल की तरह अन्य राज्यों में भी अपेक्षाकृत कम उम्र के नेताओं को कमान सौंपेंगे?
फिलहाल यह बड़ा सवाल बना हुआ है, क्योंकि राज्यों में लंबे समय से जमे नेताओं का संगठन पर अब भी प्रभाव कायम है। क्या राहुल गांधी ब्लॉक स्तर से लेकर जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक बड़ा बदलाव करेंगे? क्योंकि आज भी संगठन में कई बड़े पदों पर ऐसे नेताओं के समर्थक बैठे हैं, जो कांग्रेस को मजबूत करने से ज्यादा अपने-अपने नेताओं के इशारों पर काम करते दिखाई देते हैं। इससे कांग्रेस को चुनावों में नुकसान होता है और नेताओं के बीच गुटबाजी खुलकर सामने आती है।
असल वजह यही है कि कांग्रेस कई राज्यों में लगातार चुनाव हार रही है। एक और बड़ा सवाल यह भी है कि क्या राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस संगठन में बड़ा फेरबदल करेंगे? और क्या के.सी. वेणुगोपाल कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री पद पर बने रहेंगे, या राहुल गांधी इस जिम्मेदारी को किसी अपेक्षाकृत युवा, अनुभवी, राजनीतिक रूप से परिपक्व और रणनीतिक समझ रखने वाले नेता को सौंपेंगे?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

















