
-‘संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ’ के बाद अब छात्रों के मुद्दे पर कांग्रेस का आक्रामक रुख
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस के 84 वर्षीय राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के ‘संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ’ के नारे ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत हासिल करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब सवाल यह है कि क्या 24 जुलाई को संसद परिसर में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर लगाए गए खड़गे के नारे भी कोई राजनीतिक परिणाम ला पाएंगे? नीट पेपर लीक और जंतर-मंतर पर आंदोलनरत छात्रों के साथ कथित बर्बरता के विरोध में मल्लिकार्जुन खड़गे का आक्रोश केवल संसद परिसर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसकी गूंज राज्यसभा के भीतर भी सुनाई दी।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए बन रहे हैं प्रेरणा स्रोत
कांग्रेस के वरिष्ठ राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का जोश मौजूदा समय में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता एकजुट होकर सड़क से लेकर संसद तक सक्रिय नजर आ रहे हैं।
खड़गे अपने संबोधनों में अक्सर एक बात दोहराते हैं, “अपने हक के लिए लड़ो, संघर्ष करो। अभी नहीं तो कभी नहीं।” ऐसा लगता है कि विपक्ष ने अब इस संदेश को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि छात्र आंदोलनों के मुद्दे पर विपक्ष पहले की तुलना में अधिक एकजुट दिखाई दे रहा है और खुलकर छात्रों के समर्थन में खड़ा है।
विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण है वर्षाकालीन सत्र
यदि खड़गे के संदेश, “अभी नहीं तो कभी नहीं” और “लड़ोगे नहीं तो खत्म हो जाओगे”, को राजनीतिक संदर्भ में देखा जाए तो संसद का वर्तमान वर्षाकालीन सत्र विपक्ष के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सत्तारूढ़ भाजपा इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने के मूड में दिखाई दे रही है। इसके लिए उसने सत्र शुरू होने से पहले ही संसद के दोनों सदनों में अपने समर्थन को मजबूत करने की कोशिश की है। इस दौरान कई दलों के सांसदों के राजनीतिक रुख में बदलाव भी देखने को मिला है।
राहुल गांधी सड़क पर क्यों उतरे?
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शायद भाजपा की राजनीतिक रणनीति को भांप चुके हैं। यही कारण है कि वे संसद के साथ-साथ सड़क पर भी लगातार सक्रिय हैं।
प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च, महात्मा गांधी स्मारक पर शांति प्रार्थना और उसके बाद प्रेस वार्ता में आंदोलन के दौरान पेलेट गन से घायल हुए एक छात्र को मीडिया के सामने लाना, इन घटनाओं को कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार छात्र आंदोलन को समाप्त करने के प्रयासों में जुटी हुई है। आंदोलनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों से सरकार के मंत्रियों ने दो दौर की वार्ता भी की है। हालांकि, छात्र अब भी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं।
अब पूरे देश की नजर छात्र आंदोलन पर
दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब देश के कई हिस्सों में दिखाई देने लगा है। यह आंदोलन कब और किस रूप में समाप्त होगा, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
साथ ही, यह भी देखने वाली बात होगी कि मल्लिकार्जुन खड़गे का आक्रामक रुख और राहुल गांधी की सक्रियता इस आंदोलन को कितना राजनीतिक बल देती है तथा इसका सरकार पर कितना प्रभाव पड़ता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

















