
-संसद से सड़क तक सक्रिय विपक्ष ने बदला राजनीतिक माहौल
-छात्र आंदोलन ने भी दी नई धार
-देवेंद्र यादव-

कभी यह सवाल बार-बार पूछा जाता था कि राहुल गांधी कहां हैं और विपक्ष दिखाई क्यों नहीं देता। अब वही लोग शायद अपनी इस धारणा पर पुनर्विचार कर रहे होंगे। आज राहुल गांधी और विपक्ष देश के विभिन्न मुद्दों पर संसद से लेकर सड़क तक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।
दरअसल, राहुल गांधी और विपक्ष पहले भी जनता के बीच थे और लगातार जनसरोकार के मुद्दे उठाते रहे। लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिले पूर्ण बहुमत और कांग्रेस की लगातार चुनावी हार के कारण उनकी सक्रियता राजनीतिक विमर्श में दब गई। यहां तक कि कांग्रेस लोकसभा में इतनी सीटें भी नहीं जीत सकी थी कि उसे नेता प्रतिपक्ष का पद मिल सके।
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदली। कांग्रेस ने 99 सीटें जीतकर एक दशक बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल किया और राहुल गांधी इस भूमिका में आए। भले ही कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी, लेकिन भाजपा को पूर्ण बहुमत से दूर रखने में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इसके बाद संसद और सड़क, दोनों जगह राहुल गांधी और विपक्ष जनहित के मुद्दों पर अधिक आक्रामक नजर आने लगे।
छात्र आंदोलन को मिला राजनीतिक समर्थन
पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर जब देशभर के छात्र दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन के लिए जुटे, तब राहुल गांधी और विपक्ष ने खुलकर उनका समर्थन किया। संसद के भीतर मुद्दा उठाने के साथ-साथ आंदोलनकारी छात्रों के बीच पहुंचकर उनका मनोबल भी बढ़ाया।
ऐसा माना जा रहा है कि विपक्ष की सक्रियता से छात्र आंदोलन को व्यापक राजनीतिक और सामाजिक समर्थन मिला है। राहुल गांधी लगातार शिक्षा, रोजगार और युवाओं से जुड़े सवालों को संसद और सार्वजनिक मंचों पर उठा रहे हैं।
क्या वर्षाकालीन सत्र ‘डू ऑर डाई’ की स्थिति है?
एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या संसद का वर्षाकालीन सत्र सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए ‘डू ऑर डाई’ की स्थिति बन गया है?
सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यह सत्र इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना चाहती है। वहीं विपक्ष के लिए यह अवसर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने का है। यदि सरकार बिना पर्याप्त बहस के अपने विधेयक पारित कराने में सफल होती है, तो विपक्ष की प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं।
जनता के दृष्टिकोण से भी यह सत्र महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करता है। यदि विपक्ष कमजोर पड़ता है, तो संसद में जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
क्या इस बार बदलेगी संसद की तस्वीर?
पिछले एक दशक के संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो कई बार विपक्ष ने विभिन्न मुद्दों पर विरोध किया, लेकिन सरकार अपने विधेयक पारित कराने में सफल रही। विपक्ष के हंगामे और बहिष्कार का राजनीतिक लाभ भी कई मौकों पर सत्तापक्ष को मिला।
लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग दिखाई दे रही हैं। छात्र आंदोलन, पेपर लीक का मुद्दा और राहुल गांधी की सक्रियता ने विपक्ष को अधिक संगठित और आक्रामक बनाया है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार पहले की तरह आसानी से अपने विधेयक पारित करा पाती है या उसे विपक्ष के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।
यदि सरकार बिना व्यापक बहस के महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराती है, तो उसे विपक्ष के साथ-साथ आंदोलनरत छात्रों और युवाओं की नाराजगी का भी सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल यह स्पष्ट है कि शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर बड़ी संख्या में युवा सक्रिय हैं और विपक्ष भी इन मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है।
आने वाले दिन तय करेंगे राजनीतिक दिशा
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वर्षाकालीन सत्र वास्तव में भाजपा और विपक्ष के लिए ‘डू ऑर डाई’ साबित होगा या नहीं। इसका आकलन आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही और राजनीतिक घटनाक्रम से होगा।
हालांकि, इतना जरूर कहा जा सकता है कि छात्र-युवा वर्ग के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत हुई है कि राहुल गांधी उनकी समस्याओं को संसद से लेकर सड़क तक लगातार उठा रहे हैं। वहीं भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि वह इन मुद्दों पर अपनी राजनीतिक और संसदीय रणनीति को किस तरह आगे बढ़ाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

















